अेक लूंकड़ी भूखी मरती,
ढूंढण निकळी रोटी।
इनै-बिनै घणो तकायो,
पण किस्मत ही खोटी।
मूंडै आवै काळजियो अर,
आंतड़ियां कुरळावै।
कुण उण नै द्यै रोटी-तीवण,
कुण भोजन करवावै?
फिरै भटकती पण उण नै
नीं कोई मिल्यो ठिकाणो।
जिको दया कर दे द्यै उण नै,
अेक बगत रो खाणो।
भूखी रो जद सिर चकरायो,
बिगड़ी उण री चाल।
बैठी अेक रूंख रै हेठां,
भूख सूं पण बेहाल।
लियां चूंच में रोटी, कठी
सूं अेक कागलो आयो।
लूंकी सोच्यो स्यात हुवैलो,
अब उण रो मन चायो।
मीठै सुर में काग सूं बोली,
‘आ रे भाई काग।
आज थांरा दरसण कर
भाया, म्हांरा उघड़ग्या भाग।
कद सूं बैठ उडीकूं थांनै,
हे म्हांरा मनमीत।
म्हैं थांरै मूंडै सूं चावूं,
सुणनो मुधरो गीत।
कितरा दिन बीत्या म्हैं
थां सूं, सुण्यौ नईं संगीत।
इण कारण लागै म्हनै,
दुनियां री झूठी प्रीत।
म्हनै घणी सुहावै भाई,
थां री मुधरी बोली।
कोयल नै भी मात करो थे,
सुर में मिसरी घोळी।
भीतर तक राजी कर देवै,
चापलूस रा बोल।
सुण-सुण खुद री मान बड़ाई,
कागलियो हुयो ढोल।
सोच्यो नईं कागलै,
लूंकां कीकर करै बड़ाई?
बोल्यो, ‘कला गावणै’ री म्हैं
जनम-जात ही पाई।
सोच्यां समझां बिनां बात नै,
कांव-कांव कर काग।
गावण लाग्यो ऊँचै सुर में,
बो कनफोडू राग।
रोटी हेठां पड़ी लूंकड़ी,
झट सूं चकगे खागी।
गयो पेट में अन्न फेर तो,
पाछी ताकत आगी।
रोटी खाय’र कैवण लागी,
अब तो बस कर भाई।
कांव-कांव कर कान खा लिया,
थे तो घणी सताई।
इतरो सुणनै हुयो कागलो,
उडण तांई मजबूर।
सांच कैयो है चापलूस सूं,
रैवणो चाहिजै दूर।