हळोतियो करतां

गांवतो मोट्यार

अर सूड़ करती लुगाई

जमी सूं आस करै,

मेह बाबो आयो

सिट्टापोळी ल्यायो

गांवता टाबर

रम्मै

नाचै-कूदै

अर-हरखै,

आं सगळां रै

मन री भाषा

न्यारी न्यारी नीं है।

तीज-त्यूंहारा

रात-दिन

गांवता-बजांवता

अर नाचता लोग

भाषा री

भींत नीं बणावै।

अणूतै हेत नै

मतां पोखो

अर काड न्हाखौ

मन सूं

भाषा विज्ञान री बातां।

उतराद सूं

दिखणाद तांई

सारंगी रा बोल

अेक सा है।

हळ रै

कुस री

हूंस मांय

उगावौ

भाषा रै सुपनां नै।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : श्याम महर्षि ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-14
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