ठण्डी ठर्‌योड़ी लालचुट नाक

बिचूरै ही न्याई-निवाई देही

नरम-ऊजळा सुसियां री।

सुसिया लेवै हा बिसांई आप

थारी छाती रै नैवास में।

थरथर आंगळ्यां थारी

उतरै ही मांयली पुड़तां लग

बाथां आयै दरख़्त री।

पंपोळै हो दरख़्त थनै

अेकोअेक आपरी डाळ सूं।

छेवट छोड़ दीवी जड़ां

गूंगी चिरळाटी रै समचै ई।

रंग है थनै

थूं नीं लागण दियो धरती रै

अेक पात बापड़ै दरख़्त रो।

अंवेर ली आखी धरती

अंवेर लिया सागै

थूं थारै किणी ऊंडै पाणी

आखा दरख़्त धरती रा।

इण भांत राखी थूं

हरमेस अबोट सृष्टि नै।

स्रोत
  • पोथी : उतर्‌यो है आभो ,
  • सिरजक : मालचन्द तिवाड़ी ,
  • प्रकाशक : कल्पना प्रकाशन, बीकानेर ,
  • संस्करण : प्रथम संस्करण
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