जियां केळै रे पात पात में पात

बियां सज्जन री बात-बात में बात

पण सज्जन तो ढूंढ्यां भी नीं मिलै

अर दुरजनसिंगजी हर जगां त्यार

कै तो म्हारी परख में भूल हुई

कै बे लोग दीखण में भला दीसै

दिनूंगै सूं सांम तक ढेमकी बाजतो रेवे

एक जावे तो दूजो आय जावै

सबां री बोली एक इसारा एक

नेता लोग भी आवै लटका झटका दिखावै

जी हजूरियां री फौज में शान सूं अकड़्या जावै

म्हारी समझ में कीं नीं आई

म्हैं घेवरभाई ने पूछ्यो—भाई सा सब कांई कैवे?

केवे सो इज जाणै

जोजना, अनुसूचित जाति जनजाति गरीबी हटाओ आद-आद!

म्हैं खुद गातागम में हां

जिण सबदां को प्रयोग करै

वां सबदां रो मतलब म्हनै भी ठा नीं पड़ै

पण लागै है वोट मांगण सारू आया है

ओहो तो मांगण वाळां री टोळी है

पांच साल मांय एक बार आवै

गांव में ऊभा मूत जावै

करण-करावण; राम रा नाम!

सपना दिखावण में घनस्याम!

म्हैं झिझकतो एक नेता नै पूछ्यो—

भाई साब आप जीतग्या तो कांई करोगा?

वो टेंट में आय बोल्यो—आभै में छेद कर देऊंला

म्हैं घणो राजी हुयो!

इयां भी म्हारै गांव लोहावट में

पाणी री कमी है साठीको कोयर है

खींचण में घणो जोर लागै

तो लूंठो जादूगर दीसै...

म्हैं अरज करी— थोड़ो करतब रो नमूनो तो बताओ!

खटाक सूं नेता बोल्यो—दिखाऊं पण जीत्यां पछै...

क्यों?

जीतण वाळा इज छेद कर सकै— केय’र नेता मुस्कायो

घेवरभाई दडूक्या—रैवण दो सै बातां

हर पांच बरस में इसी बातां सुण'र

कांन रा कीड़ा झड़ग्या...

तो सब बातां मांयली बातां है

जीत्यां पछै आज तांई कोई आयौ; सो आसी?

बिलमावणी बातां है।

मूंडो भी नहीं बतासी

घेवरभाई रो गरूजण सुण'र म्हैं डर नै भाग छुट्यो।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : गुलाबचन्द कोटड़िया ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-17
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