अेक रौ टंकोरौ बाजगौ

रात अवाजहीण है

अर, अै क्षण थूं नींद नै भेंट कर चुकी व्हैला।

आकास गंगा चांदणी में धुप’र

और्‌यूं धोळी व्हेयगी व्हैला।

आं सगळा पळकता संकेतां रै प्रति

म्हैं अणुत्तरित हूं, स्फूर्तिहीण!

सोचूं हूं— म्हैं थनै क्यूं जगाऊं, कीकर दूं कोई तकलीफ?

अर लोग तो कैवै इज है के

अध्याय समाप्त हुयगो है

नित रा निर्मम थपेड़ा सूं

निकमी हुयगी है प्रीत री नाव,

म्हां अबै रैयगा हां— सबदहीण।

पछै क्यूं हुवां आपसरी में संवेदित

क्यूं नीं मान लेवां होणी री देण

(जिको कीं देवै।)

तारा भर दियो अंबर नै रात री भुजावां में,

अेक रौ टंकोरौ बाजगौ

रात सबदहीण है।

अैड़ा ऊंचा क्षणां में इज तौ

कोई उठ सकै इत्तौ के

बतळाय सकै—

काळ नै, इतिहास नै

अर सकळ स्रस्टी नै।

स्रोत
  • पोथी : अपरंच अक्टूबर-दिंसबर 2015 ,
  • सिरजक : ब्लादिमीर मायकोवस्की ,
  • संपादक : पारस अरोड़ा ,
  • प्रकाशक : अपरंच प्रकासण
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