(1)
लोग आवे छै,
बूझै छै थारो नांव—
अर म्हूं
म्हारो नांव बताद्यूँ छूँ
सब समझै छै
के या दनाँ
म्हारा म्हँ में
म्हूं न र्हूं छूँ
तू रहवै छै।
(2)
जद
पलकां की कोराँ सूँ
खड़-खड़ के
भाग ज्या छै नींद—ऊँ बेर
म्हूं भी न्हँ होऊँ
म्हारै अनै-कनै;म्हँने सुणी छै
के थारी आँख्याँ में
म्हारो चतराम
ढूंढे छै लोग-दणीं
रात का ईं तीसरा प्हैर में
म्हूं कठी ढूंढूं
म्हाँरा न्हँ होबा के पाछै भी
थारी आँख्याँ
चाँदनी का समंदर में?