अेक
लोग आवै छै,
बूझै छै थारो नांव—
अर म्हूं
म्हारो नांव बताद्यूं छूं
सब समझै छै
के यां दनां
म्हारा म्हं में
म्हूं न र्हूं छूं
तू रहवै छै।
दो
जद
पलकां की कोरां सूं
खड़-खड़ के
भाग ज्या छै नींद—
ऊं बेर
म्हूं भी न्हं होऊं
म्हारै अनै-कनै;
म्हंनै सुणी छै
कै थारी आंख्यां में
म्हारो चतराम
ढूंढै छै लोग-दणीं
रात का ईं तीसरा प्हैर में
म्हूं कठी ढूंढूं
म्हांरा न्हं होबा कै पाछै भी
थारी आंख्यां
चांदनी का समंदर में?