बरस बीतग्या—

हरी घास रै उण कूणै में

बाथां बंधिया मरद-लूगाई

नैण-नैण में नैण ढाळता,

सांस पीवता, भूल, जीवता जूण पराई,

ज्यूं ऊभा हा!

सोचूं हूं—

बै भावैजोग मिल्या हा,

अबै बिछड़ग्या व्हैला!

छानै-ओलै प्रीत करी ही—

कांकण-डोरै बंधग्या व्हैला!

कुण जाणै अब तांई दोनूं मरग्या व्हैला!

पण तो ई—

जद भी जाऊं इण बाग फिरण नै

अै कनेर रा फूल-फूल्या फूल दीसै

हरसिंगार री अै झड़ती कळियां थम जावै,

हरियाळी मर जावै सगळी!

जीवै फगत बाग में बै ई—

हरी घास रै उण कूणै में

बाथां बंधिया मरद लुगाई

नैण-नैण में नैण ढाळता,

सांस पीवता, भूल, जीवता जूण पराई।

स्रोत
  • पोथी : मरूवाणी ,
  • सिरजक : सत्यप्रकाश जोशी ,
  • संपादक : रावत सारस्वत ,
  • प्रकाशक : राजस्थान भासा प्रचार सभा, जयपुर ,
  • संस्करण : 04, अप्रेल
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