भाषा रै पाण ई राजस्थानी रजवट रौ वट कायम रहसी
सुखवीरसिंह गहलोत : डिंगळ काव्य में आपरी मोकळी रुचि है। ओ शौक आपनै ठेट सूं कियां लाग्यौ?
शक्तिदान कविया : म्हारी जनम भोम बिराई कवियां री (जोधपुर सूं आथूणी छेहड़ै) ख़ासतौर सूं, डिंगळ काव्य रै हिसाब सूं ‘छोटी काशी’ कहीजती। कवि धनजी लाळस रै शब्दां में ‘राजत है कवियां गुण रासी, कविता करण दूसरी कासी।' डिंगळ काव्य रचना म्हारै परिवार री वंशगत परंपरा रही। पुरुषां रै सागै म्हारै कुटुंब में केई महिलावां ई काव्य रचना में बड़ा प्रवीण ही। म्हारै माथै वांरौ घणौ प्रभाव रह्यौ। इण कारण टाबरपण में ई म्हैं जद विद्यालय में पढतौ, म्हारी काव्य रचना कानी रुचि रही अर म्है ‘करनी यश प्रकाश’ नांव सूं भगवती करणी माता री अेक स्तुति बणाई। जिकौ जाणकार अर गुणीजनां पसंद करी। इणी’ज भांत नवमी कक्षा में पढती वखत म्हैं अेक ‘त्रिकुट बंध’ डिंगळ गीत बणायौ जिकौ काव्य रचना रै हिसाब सूं अति कठिन गिणीजै। इणनै ई विद्वद्जनां घणौ पसंद कियौ। राजस्थानी रा सुप्रसिद्ध साहित्यकार स्व.उदयराजजी उज्जवल म्हनै डिंगळ गीत पढण रौ सही लहजौ सिखायौ। इण भांत डिंगळ काव्य रै प्रति म्हारै सहज अनुराग री कूंपळ नै अनेक विद्वानां आपरै आशीष रै जळ सूं सींच नै सरसाई, वां सगळां रौ म्हैं घणौ आभारी हूं।
सुखवीरसिंह गहलोत : डिंगळ काव्य पाठ में आपरी आछी गति है। इणरै काव्यपाठ री विशेषतावां बतावतां थकां मौजूदा वखत में उत्तम काव्य पाठ करणवाळा कीं कवियां रा नांव बतावौ?
डॉ. शक्तिदान कविया : डिंगळ काव्यपाठ री आपरी अेक न्यारी परंपरागत विशेषता है। डिंगळ रौ छंद शास्त्र ई न्यारौ है अर उणरी पाठ विधि पण कोई री नकल कोनी। डिंगळ छंदा में जिकौ ओज अर नाद सौंदर्य है, वो दुनिया रै दूजै साहित्य में शायद ई मिळै। डिंगळ छंदा में विषय रै मुजब सबद अर गति री विशेषता है। डिंगळ छंद सरल सूं सरल भाषा में अर धीमै लहजै में पढणवाळा ई होवै तो दूजी कानी अेक ई छंद में भांत-भांत रा अनुप्रासां री छटा रै सागै अबखा अटपटा छंद ई मिळै। डिंगळ छंदां में सै सूं कठण डिंगळ गीत त्रिकुटबंध है। इण गीत में सगळा शब्द अेक जिसै अनुप्रासां अर वैण में सगळा शब्द अेक जिसै अनुप्रासां अर वैण सगाई सागै आवणा चाइजै। इणमें अेक इज सांस में पूरौ दूहालौ पढणौ जरूरी। डिंगळ गीतां में दूजा गीत सपंखरौ, बड़ौ साणोर, झमाल, चित्तइलोळ इत्याद अर डिंगळ छंदां में रोमकंद, रेणकी, सारसी इत्याद पाठ विधि री दीठ सूं घणा मनभावणा अर लुभावणा है। आज रै वखत में डिंगळ काव्य पाठ करण वाळा ठावा कवियां अर विद्वानां में सर्वश्री अनोपदानजी वीठू (गांव झिणकली-बाड़मेर), रामदानजी बारहट (गांव सांगड़-जैसलमेर), खीमदानजी बारहट (गांव बाळेवा-बाड़मेर), गोविंददान जी कविया (बिरई-शेरगढ), रामदानजी मोतीसर (सीथळ-बीकानेर), सोभकरणजी चारण (मोतीसरी-जाळोर) अर कैलाशदान जी उज्जवल प्रमुख है।
सुखवीरसिंह गहलोत : आप राजस्थानी गद्य ई घणौ रळिया मणौ लिखौ। वचनिका शैली री विशेषतावां बतावतां थकां आज रै जुग में इण शैली री उपयोगिता बतावण री कृपा करौ?
डॉ. शक्तिदान कविया : राजस्थानी में गद्य साहित्य री समृद्ध परंपरा रही है। ज्यूं हवेलियां में झीणी कोरणी रा झरोखा मिळै, उणी’ज भांत अठा रै गद्य में बात बणाव अर वचनिका शैळी रा नमूना घणा चोखा अर अनोखा मिळै। संस्कृत में ‘वृतगंधी गद्य’ कहीजै, जिणरौ अर्थ होवै के जिण गद्य में छंद री सुगंध आवै। इणी’ज भांत वचनिका शैली में ई वो इज लिख सकै के जिकौ कवि हृदय होवै अर जिणरै दिल दरियाव में सबद रूपी मोतियां रा आसेर हबोळा खावै। अनुप्रासां री छटा में भावां री घनघटा उमड़ै। उण गद्य में लोच अर मिठास री इधकाई लखावै, आज रै जुग में ई इण शैली री उपयोगिता खरी है। राजस्थानी री इण रूपाळी अर रळियावणी विधा नै जीवती राखणी जरूरी है। इणसूं नैना-नैना वाक्यां में तुकांत गद्य रा नमूना पाठका नै तुरंत कंठ हो जासी। राजस्थानी री मौलिक विशेषतावां री माळा री अेक मूंघी मणि रै रूप मे वचनिका शैली री सुरंगीखांत किणी भांत मिट नीं जावै, इण कारण रुखवाळी आपाणौ फरज बण जावै।
सुखवीरसिंह गहलोत : आपरी राजस्थानी कृतियां किसी-किसी है? वांरो संक्षित परिचय दिरावौ?
डॉ. शक्तिदान कविया : म्हारी प्रकाशित कृतियां में ‘लाखीणी (लोककथावां)’ ‘रंगभीनी’, ‘सोढायण’, ‘काव्यकुसम’, ‘कविमत मंडण’, ‘फूल सारू पांखड़ी’, ‘अेलीजी रौ राजस्थानी अनुवाद’ अर ‘संस्कृति री सोरम’ इत्याद है। इणां में घणखरी संपादित कृतियां है अर कीं मौलिक कृतियां है। ‘संस्कृति री सोरम’ वचनिका शैली में लिख्योड़ा साहित्यक निबंधां रौ संग्रह है। इण भांत म्हारी कुल 13 कृतियां प्रकाशित है।
सुखवीरसिंह गहलोत : आज रै जुग में लिखीजण आळी राजस्थानी अतुकांत कविता रै बारै में आपरा कांई विचार है?
डॉ. शक्तिदान कवियां : कविता भलांई तुकांत हुवौ के अतुकांत, उण में लय अर यति रौ नाद जरूरी है, कविता रौ असली आनंद नाद सौंदर्य है। आ बात पक्की है के जिकौ कवि छंदोबद्ध काव्य रचना नीं कर सकै वो अतुकांत कविता ई पाछी अर सही नीं लिख सकै। ओ ई कारण ई के आज अतुकांत काव्य लिखण-वाळां री तो भीड़ लाग री है पण वा आम आदमी तांई नीं पूग री है। सर्वश्री कन्हैयालालजी सेठिया, सत्यप्रकाशजी जोशी अर नारायणसिंहजी भाटी इत्याद री अतुकांत कवितावां इण कारण चोखी लागै के अे कविगण मूळरूप सूं शुद्ध छंदां रा रचनाकार है। अतुकांत री सुविधा बांचण में है, सीखण में नीं। इण कारण इसी कवितावां री उमर घणी औछी होवै। अतुकांत कवितावां री ओट में आजकाल घणी अकवितावां ई मिलै, इण कारण इण विधा री लोकप्रियता दिन-दिन घट रही है अर आम जनता इणसूं दूर हट रही है।
सुखवीरसिंह गहलोत : राजस्थानी छंदबद्ध कविता रै भविष्य बाबत आपरा कांई विचार है?
डॉ. शक्तिदान कवियां : राजस्थानी साहित्य रै अनूठापणै रौ अेक प्रमुख कारण इणरा भांत-भांत रा छंद है। संसार री सगळी भाषावां में अमरकाव्य कृतियां तो छंदोबद्ध रूप में ई मिळै। म्हनै तो राजस्थान री जूनी हवेल्यां, जूना ग्रंथ, जूना चित्राम अर जूनी बातां रै ज्यूं छंदां री जूनी जाजम ई पाछी जमती लखावै। बदळाव रौ चक्कौ घूमतौ थकौ पाछौ उणी’ज पूठीनै ठिकाणै लावै। किनारां बिना नदी नीं अर छंद बिहूणी कविता नीं। इण कारण छंद बद्ध कविता रौ भविष्य म्हनै तो ऊजळौ ई लखावै।
सुखवीरसिंह गहलोत : आपरी ताजी गद्यकृति ‘संस्कृति री सोरम’ इण बरस राजस्थानी भासा साहित्य अर संस्कृति अकादमी कानी सूं ‘सूर्यमल्ल मीसण शिखर पुरस्कार’ सूं सम्मानित हुई, उणरी विषय वस्तु, शैली अर भाषा बाबत आपरा विचार प्रगट करावौ?
डॉ. शक्तिदान कवियां : म्हारी पुस्तक ‘संस्कृति री सोरम’ अेक निबंध संग्रह है। सगळै निबंधां में म्हैं वचनिका शैली निभाई है। अकादमी जिण महाकवि री स्मृति सरूप म्हनै ओ पुरस्कार दियौ इणसूं म्हारी आत्मा संतुष्ट हुई है। रही बात विषय वस्तु, भाषा अर शैली री, सो इण बाबत में म्हारै मूंडै सूं कांई कैवूं, इणरौ निर्णय अकादमी कियौ ई है अर बाकी पाठक करसी।
सुखवीरसिंह गहलोत : मौजूदा वखत में आपरै हिसाब सूं राजस्थानी भाषा रै उत्थान सारू किण भांत रा प्रयत्न होवणा चाइजै?
डॉ. शक्तिदान कवियां : राजस्थानी भाषा रै उत्थान सारू अेक तो अठा री शब्द-संपदा रौ ज्ञान विद्यार्थियां अर लेखकां नै पूरी तौर सूं होवणौ चाइजै। भाषा री गरिमा सारू सही शब्द रौ सही रूप में प्रयोग होवणौ चाइजै। अेक ई शब्द नै अठारै तरै सूं लिखण री कुप्रथा राजस्थानी रौ स्टेंडर्ड रूप बणावण में बाधक होवै। आज भाई लोग मन में आवै ज्यूं लिखै। आ अराजकता आछी कोनी। डाड-डाढ, डोड-डोढ, काड-काढ अर भाटां-भाठां इत्याद शब्दां रौ फरक समझै ई कोनी, राजस्थानी में अबार संक्षिप्त कोष, व्याकरण अर राजस्थानी साहित्य रौ इतिहास इत्याद पोथियां री घणी जरूरत है।
राजस्थानी पठन पाठन री व्यवस्था होवणी घणी जरूरी। राजस्थानी में लोकोक्तियां, वातां-ख्यातां अर लोककथावां रौ अखूट खजानौ है। इणरौ सही रूप सूं संरक्षण जरूरी है।
सुखवीरसिंह गहलोत : राजस्थानी में निबंध री कांई स्थिति है? कांई आप उण स्थिति सूं संतुष्ट हौ? इण बाबत आप आपरा विचार बतावौ?
डॉ. शक्तिदान कवियां : राजस्थानी में निबंध लेखन री स्थिति हाल तांई संतोषजनक नीं है। इणरौ कारण ओ है के निबंध साहित्य री घणी ठोस अर अबखी विधा है। इण में भाषा अर भावां रौ संतुलन राखता थकां लेखक री निजू छाप इण माथै रैवणी जरूरी है। इण रै साथै ई ललित अर काव्यात्मक शैली रा निबंध लिखणा घणा दोरा है। सबदां री बोहळी जाणकारी अर विषय री ऊंडी ओळखाण रै संजोग बिना निबंधां में निरख अर ओप नीं आवै। निबंध गद्य री कसौटी पुस्तक रूप में चोखा निबंध विरळा ई देखण में आवै। श्री जहूरखां मेहर, डॉ. कन्हैयालाल राजपुरोहित इत्याद लिखारा ठावका निबंध लेखकां में गिणीजणजोग है। निबंध री धारा मोड़ी सरू हुई, पण भविस ऊजळौ है।
सुखवीरसिंह गहलोत : दुनिया री दूजी भाषावां ज्यूं राजस्थानी भाषा री आपरी निकेवळी पैचाण है? वे कांई विशेषतावां है, जिणरै कारण आ भाषा आपरौ न्यारौ-निकेवळौ विशिष्ट रूप राखै?
डॉ. शक्तिदान कवियां : राजस्थानी भाषा भारत री जूनी अर जोरदार भाषावां में ठावी ठौड़ राखै। इणरौ व्याकरण सब सूं सोरौ अर घणौ सिरै। हिन्दी में ‘प्रत्येक पुस्तक रा मूल्य चार आने है’ रौ राजस्थान अनुवाद हुवै— ‘पोथी दीठ पावलौ’। कैवण रौ मतलब ओ । सात सबदां रौ सही अनुवाद तीन सबदां में हुयग्यौ। इणी भांत—‘जाते हुए को देखा’ रौ अनुवाद ‘जावतौ देखियौ’ में ई चार सबदां रौ अनुवाद दो सबदां में हुयग्यौ। इण भाषा रौ सबद सागर इतरौ विशाळ है के संसार री किणी भाषा में इतरी अथाग सबद संपदा नीं है।
इण भाषा रौ उल्लेख संवत 835 में जाळौर में उद्योत सूरि रचित ‘कुवलय माला’ में चिट्टै रूप सूं मिळै। इण रै साहित्य री जितरी भांत-भंतीली विधावां गद्य, पद्य पर वचनिका में मिळै, उतरी कोई दूजी भाषा में नीं लाधै। बात-बणाव अर वचनिका री रूपाळी ने रळियावणी शैली अर वैणसगाई जैड़ौ अनूठौ अलंकार दुनिया में दूजी ठौड़ नीं मिळै। हर चीज अर क्रिया रा सबद तीन रूपां में मिळै—आदरसूचक, साधारण अर तिरस्कार सूचक। राजस्थानी रौ न्यारौ छंद शास्त्र है, न्यारौ काव्यशास्त्र है, न्यारौ सबद कोस अर न्यारी व्याकरण है।
राजस्थान में राजस्थानी री जाणकारी बिना कोई ई अध्यापक नैनै टाबर नै हिन्दी सबदां रौ सही स्वरूप अर अरथ नीं समझाय सकै! कोई पण डाक्टर मरीज री पीड़ रौ सही अंदाज नीं लगाय सकै। कोई ई नेता गांवां में लोकप्रिय नीं हो सकै।
इण भाषा में लोकगीतां री लाखीणी लड़ियां, कहावतां री सारभरी कड़ियां, वातां-ख्यातां रौ इधकौ वरणाव, रमण-काव्य री अनूठी रंगत, वीरता, भक्ति अर सिणगार री त्रिवेणी रै साथै ऊंट, घोड़ां अर हाथियां रै वखाण रा रूपाळा छंद, वर्णक काव्य री सुप्यारी शैली इत्याद असंख्य रतनां रौ रतनाकर राजस्थानी भाषा है, जिण रै अस्तित्व रै साथै इण प्रांत रौ जस अर अंजस जुड़ियोड़ौ है। अठा री लोक संस्कृति रा सगळा सुरंगा चित्राम, रजवट रौ वट अर हेत री हाटां इणी भाषा रै मांडणां में मंडियोड़ी है। आ जनता रै जीव री जड़ी है, पण संविधान में मान्यता बिना अबार तो उपेक्षित पड़ी है।
सुखवीरसिंह गहलोत : आज, जदके राजस्थानी रै प्रति लोगां रौ सूतोड़ौ अनुराग जाग उठ्यौ है, इणनै आम लोगां सूं जोड़ण सारू कांई-कांई प्रयास करीजणा चाइजै? राजस्थानी रौ वो कांई रूप हुवणौ चाइजै के सगळा ई जणा उणसूं जुड़ सकै, उणनै अपणाय सकै?
डॉ. शक्तिदान कवियां : देस में जद सूं आजादी आई, लोगां रै मन में मायड़भोम अर मायड़भाषा रै खातर ममता अर सम्मान री भावना निजरां आई। आत्म सम्मान री रखवाळी तो मायड़, मायड़ भोम अर मायड़भाषा री त्रिवेणी सूं ई संभव हुवै। आज भाषा रौ गौरव तो सगळा अंगेजै, पण आम आदमी सूं जोड़ण रौ किसौ ठीक माध्यम हुवै? ओ निरणै अेकमत नीं दीसै।
राजस्थानी नै सगळा जणा अेकमत हुय’र अंतस सूं अपणावै, इण खातर बोलचाल री भाषा में तो बोलियां, उपबोलियां इत्याद रौ आंचलिक रूप है ज्यूं ई रैवण में कोई हरज नीं, पण साहित्य या इतिहास जैड़ा महताऊ विषयां में भाषा रौ साहित्यिक ठावौ अर ठीमर रूप रैवणौ चाइजै, जिणसूं सुणण में ओज अर लोच रौ दरसाव हुवै। इण काम सारू अेक चीज रा अनेक नाम याद करण री अनिवार्यता पढाई में हुवणी चाइजै या छोटी अर सारभरी पोथियां हरेक पाठक सारू उपलब्ध हुवणी चाइजै, ताकै सही ठौड़ सही अरथां वाळा सबदां रौ प्रयोग हुय सकै।
गांवेडू भांयकां में खेती रा सबद, गैणा-गांठा, व्याव-वधाणा, आणा-टाणा, तीज-तिंवार, मेळा-खेळा, गोठ-गूघरी, रैवाण-हथाई, वातां-ख्यातां, गीतां रा गोरबंद अर जूना छंद, सगळां में जकी मौलिक अर फबती शब्दावळी मिळै, उणनै सीखण री जरूरत है। इण सारू साहित्यिक, प्रतिष्ठान, अकादमी, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग जैड़ी संस्थावां नै समयबद्ध योजनावां तय्यार कर’र ठावा अर ठोस कार्यकर्तावां नै इण काम में जोड़णा चाइजै। उण काम रै सही रूप रौ मूल्यांकन करण सारू वयोवृद्ध राजस्थानी विद्वानां री अेक समिति हुवणी चाइजै।
राजस्थानी री मौलिक ध्वनियां, व्याकरण री विशेषतावां अर भाषा रौ मिठास अर समृद्धि समझावण री छोटी-छोटी पोथियां छपणी चाइजै। पण उणसूं पैली ‘माणक’ जैड़ी पत्रिका नै अेक ‘सीरीज’ चलावणी चाइजै। हर महीने अेक विद्वान सूं राजस्थानी सबदां रै भांत-भंतीलै रूप सूं भांत-भांत रा अरथ कीकर बदळै अर शुद्ध रूप किसौ है, इणरौ उदाहरण पाठकां सामी आवणौ चाइजै। अेक साधारण मिनख नै ओ लखावणौ चाइजै के राजस्थानी अेक न्यारी, निराळी, रूपाळी, समृद्ध अर सांगोपांग भाषा है, जदैई वो इणसूं जुड़ैला।
पूरै प्रांत में साहित्यिक भाषा थेट सूं अेक रैयी अर आज ई उणरौ ‘स्टैंडर्ड’ रूप अेक रैवणौ चाइजै। बोलियां रा सबद होता थकां ई उणरौ ठावौ अर ठरकैदार रूप निखरणौ चाइजै। इण में हियै री उदारता अर धरती री ममता रा संस्कार जरूरी है।
सुखवीरसिंह गहलोत : ‘माणक’ रै मारफत आप उणरा पाठकां नै कांई संदेश देवणौ चावौला?
डॉ. शक्तिदान कवियां : ‘माणक’ रा सगळा पाठक राजस्थानी रा हेताळू है। वांनै अरज है के वे राजस्थानी साहित्य खूब बांचै अर बंचावै। आपणी पुराणी साहित्यिक परंपरा वणी समृद्ध है। इणरी जाणकारी होवणी चाइजै, मायड़भाषा री तरक्की बिना राजस्थान प्रदेस री अशिक्षा नीं मिट सकै। भाषा रे पाण ई राजस्थानी रजवट रौ वट कायम रहसी। इण वास्तै राजस्थान रै उत्थान सारू राजस्थानी भाषा रौ उत्थान जरूरी है।
रहसी राजस्थान, राजस्थानी राखियां।
महि भारत रौ मान, दूणौ जिणसूं दीपसी।।