साहित्य पर बंतळ
रचनाकार सामाजिक संवेदना जगावै मीठेश निरमोही : आपरी सरूआत अर अबार री कवितावां में कांई फरक है? सत्यप्रकाश जोशी : म्हारी आं कवितावां में ‘वेरायटी’ रौ फरक है। लय-छंदां में फरक है। सबदां में फरक है। ‘बोल भारमली’ में नारी उछाळौ है। वे सेक्स री कवितावां
ओ धन पाछौ हाथ नीं आवणौ है श्यामसुंदर भारती : राजस्थानी साहित्य, खासकर कविता कांनी आपरी रुचि किंयां होई? नारायणसिंह : राजस्थानी साहित्य कानी म्हारी रुचि रौ सब सूं बडौ कारण राजस्थानी संस्कृति सूं म्हारौ गैरौ लगाव है। म्हांरै गांव में जिकौ सांस्कृतिक
मायड़ भाषा जन जन री मूळ अस्मिता हुवै यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’ राजस्थानी अर हिंदी रा चावा लिखारा। हिंदी में आपरी केई पोथ्यां छप्योड़ी। राजस्थानी में ‘हूं गोरी किण पीव री’, ‘जोग-संजोग’, ‘चांदा सेठाणी’ उपन्यास अर ‘ताश रौ घर’ नाटक छप्या थका। चन्द्रजी नै