साहित्य पर बंतळ
म्हारी फिलमां होमवर्क बिज्जी री लोक कथा ‘दुविधा’ पछै मुक्ति बोध री रचनावां माथै ‘सतह से उठता आदमी’ फिलम बणा’र कला-फिलमां रा निदेसक मणी कौल फेर चरचा में आया। अबार दिल्ली रै आठवैं फिलम फेस्टीवल में वांरी छोटी फिलम ‘अराइवल’ नै सिरै फिलम होवण रौ इनांम मिळियौ। तेजसिंघ
रचनाकार सामाजिक संवेदना जगावै मीठेश निरमोही : आपरी सरूआत अर अबार री कवितावां में कांई फरक है? सत्यप्रकाश जोशी : म्हारी आं कवितावां में ‘वेरायटी’ रौ फरक है। लय-छंदां में फरक है। सबदां में फरक है। ‘बोल भारमली’ में नारी उछाळौ है। वे सेक्स री कवितावां
राजस्थानी नै मानता अवस मिळसी : पुरुषोत्तम स्वामी पुरुषोत्तमदास जी स्वामी रौ जलम सन 1913 में बीकानेर में होयौ। आप राजस्थानी हिन्दी अर संस्कृत रा मानीता विद्वान। अबार स्वामीजी ‘राजस्थानी ज्ञानपीठ संस्थान बीकानेर’ रा पीठाधिपति अर ‘राजस्थानी गंगा’ नांव
ओ धन पाछौ हाथ नीं आवणौ है श्यामसुंदर भारती : राजस्थानी साहित्य, खासकर कविता कांनी आपरी रुचि किंयां होई? नारायणसिंह : राजस्थानी साहित्य कानी म्हारी रुचि रौ सब सूं बडौ कारण राजस्थानी संस्कृति सूं म्हारौ गैरौ लगाव है। म्हांरै गांव में जिकौ सांस्कृतिक
रावत सारस्वत राजस्थांनी भासा रा नांमी विदवांन। लारला 30-40 बरसां सूं राजस्थांनी रा भांत-भांत रा कामां सूं जुड़िया थका। आप राजस्थांनी भासा साहित-संगम, बीकानेर रा सभापती रह्या अर राजस्थांन भासा प्रचार सभा, जैपर रा सचीव ई। सचीव पद माथै तौ इण वगत ई छै। ‘माणक’
मायड़ भाषा जन जन री मूळ अस्मिता हुवै यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’ राजस्थानी अर हिंदी रा चावा लिखारा। हिंदी में आपरी केई पोथ्यां छप्योड़ी। राजस्थानी में ‘हूं गोरी किण पीव री’, ‘जोग-संजोग’, ‘चांदा सेठाणी’ उपन्यास अर ‘ताश रौ घर’ नाटक छप्या थका। चन्द्रजी नै