राजस्थांनी रा जांणीता अर मानीता कवि कन्हैयालालजी सेठिया नै कुण नीं जांणै? ‘आ धरती गोरा धोरां री’, ‘औ जमीन रौ धणी के वौ जमीन रौ धणी’, ‘अरे घास री रोटी ई जद बन बिलावड़ौ ले भाग्यौ’  इत्याद अलेखूं कवितावां राजस्थांन री धरती अर संस्क्रती सूं तौ ओळखांण करावै ई करावै, साथै ई मूळ भारतीय संस्क्रती सूं ईं जोड़ै।

 

केन्द्रीय सूचना अर प्रसारण मंत्री वसंत साठै रै सबदां में कन्हैयालाल सेठिया जैड़ा कवि ई आपरी रचनावां री मारफत आपां री संस्क्रती, दरसण अर अध्यातम रा मूळ आधारां नै सांमी लावता थकां कायदै री समाज व्यवस्था में जीवण सारू प्रेरित कर सकै।

 

पदम मेहता : कविता किणनै कहस्यां, कविता री कांईं जरुत, मतलब के कविता रै बाबत आपरा विचार?

 

कन्हैयालाल : म्हैं तौ कविता नै अेक बौत ई गंभीर विधा मानूं। इणरी मारफत जनमानस में जीवण रा सांच थरपिया अर जगाया जाय सकै। कविता जीवण नै समग्र-रूप सूं समझवा री प्रेरणा देवै। औ ई कविता रौ कांम अर आ ई कविता री जरुत। सै'ज रूप सूं हरेक ई आदमी रै हिरदै में भावनावां होवै, जिकौ वांनै ‘सै क्यूं’ रै साथै जोड़’र देख सकै, वौ ई कवि।

 

पदम मेहता : आप कद सूं कवितावां लिखौ अर आपनै कवितावां रचवां री प्रेरणा क्यां सूं मिळी?

 

कन्हैयालाल : म्हैं सौळाक बरस री ऊमर सूं कवितावां लिखबौ सरू कीधौ, अर प्रेरणा म्हारी जलमजात ही, किणी दूजै सूं कोनी मिळी।

 

पदम मेहता : सुणियौ के पैला राजनीती सूं ईं आपरौ लाग-लगाव हौ? राजनीती में कुणसा दरसण आपनै प्रभावित करिया अर क्यूं?

 

कन्हैयालाल : म्हैं राजनीति सूं सीधौ-सीधौ प्रभावित तौ कदैई कोनी व्हियौ, पण कीं खास बातां अर कीं खास सवालां रै वास्तै म्हैं राजनीति सूं जुड़ियौ। अेक तौ राजस्थांनी भासा नै राजस्थांन री भासा बणावा री बात ही, दूजौ आबू रौ विलै पाछौ राजस्थांन में करावणौ हौ, अर तीजौ राजस्थांन रा लोगां री सेवा रै वास्तै खासकर राजस्थांन में जिकी जळ री खांमी है, उणरै अभाव री पूरत सारू म्हैं राजनीति सूं जुड़ियौ। बाकी म्हारी दिलचस्पी राजनीति में कदैई कोनी ही।

 

पदम मेहता : आप जिकी अबखायां अर सवालां सारू राजनीति सूं जुड़िया, वै तौ हाल ई कोनी सुळझी। हां, अेक आबू रौ विलै तौ जरूर राजस्थांन में व्हैगौ, तौ फेर राजनीति सूं हटवा रौ कांईं कारण होयौ?

 

कन्हैयालाल : जद राजनीतिक दळां अर गुटां रै आधार माथै लोग अेक दूजै सूं अळूझवा लागगा, तौ देस री राजनीति रौ दरसाव म्हारी निजरां में सूगलौ व्हैगौ, अर म्हैं राजनीति नै छोड-छिटकाय दीन्ही। वीयां ईं राजनीति म्हारौ असली मारग तौ हौ आथ कोनी।

 

पदम मेहता :  आप राजस्थांनी अर हिन्दी दोनूं भासावां में लिखौ। आं में सूं कुणसी भासा नै खुद रै ज्यादा नज़दीक  मांनौ।  अर कांईं दोनूं भासावां में साथै-साथै लिखतां, किणीं भांत री दोराई कोनी व्है?

 

कन्हैयालाल : वीयां राजस्थांनी म्हारै हिरदै रै बौत समीप है। पर क्यूं के राजस्थांनी रौ छेत्र, राजस्थांन ई है अर म्हनै म्हारा विचार सारै संसार में पुगाणा है, खाली हुन्दुस्तांन में ईं नीं। इण वास्तै म्है हिंदी रौ जरियौ ई पकड़्यौ, उरदू रौ जरियौ ई पकड़्यौ अर थोड़ौ-बौत अंगरेजी रै मांय ई लिख्यौ। हाल वौ प्रकासित कोनी व्हियौ, जिकौ म्हैं अंगरेजी रै मांय लिखियौ।

 

पदम मेहता : दूजा ई केई कवियां दो-दो भासावां में लिखियौ, पण वै ई इण बात नै मांनी के कवि री संवेदना री मूळभासा तौ अेक ई होय सकै। ज्यूं रवीन्दर नाथ टैगोर कवि तौ बंगाली रा हां; पण कदै-कदास अंगरेजी में ईं कवितावां लिख लेता। आप कांईं सोचौ?

 

कन्हैयाला : म्हैं राजस्थांनी भासा नै म्हारी संवेदना रै ज्यादा नजीक देखूं। राजस्थांन रौ जिकौ अेक खास वातावरण है, उणरी वजै सूं राजस्थांनी में लिखणौ म्हनै ज्यादा प्यारौ लागै, क्यूंके म्हैं आप उण वातावरण में ई पळ’र मोटौ व्हियौ। पण म्हनै राष्ट्रभासा री सिमरिधी ई घणी आछी लागी, अर इण वास्तै म्हैं म्हारा विचार रास्टभासा में ईं लिखूं। अर म्हनै वीं लिखाई में किणीं भांत री कमी मैसूस कोनी होवै।

 

पदम मेहता : कांईं कविता रै अलावा किणीं दूजी विधा में लिखवा रौ ई कदै कांम पड़ियौ?

 

कन्हैयालाल : म्हैं राजस्थांनी रै मांय गद्य में ईं लिखियौ। ‘गळगचिया’ म्हारी गद्य री पोथी। राजनीतिक लेख ई पैला म्हैं, म्हारै राजनीतिक जीवण रै दिनां लिखिया करतौ, जिका ‘नवभारत टाइम्स’ अर ‘अमर भारत’ जैड़ा पत्रां में छपिया करता।

 

पदम मेहता : कांईं ‘लीलटांस’ रे पछै कोई दूजी कविता-पोथी त्यार कीवी?

 

कन्हैयालाल : आंईं दिनां ‘धर कूंचां धर मजलां’ रै नांव सूं म्हारी नवी पोथी छपी। इणरै मांय म्हैं दूहा छंद रौ इस्तेमाल करियौ। सब भांत री सैलियां अर छंदां में लिखवा रै पछै म्हैं इण नतीजै माथै पूगौ के कम सूं कम सबदां में गहरी सूं गहरी बात कहबा रै नातै ‘दूहै’ रौ मुकाबलौ कोनी।

 

पदम मेहता : आप राजस्थांनी रौ जूनौ साहित ई बांच्यौ होसी। कीं टाळवी पोथ्यां रा नांव लेणा होवै, तौ कुण सी पोथ्यां लेस्यौ, अर क्यूं?

 

कन्हैयालाल : म्हैं राजस्थांनी रौ जूनौ साहित बेजां कमती बांच्यौ। अर जितरौ बांच्यौ, उणमें ‘बेलिकिसण रुकमणी री’ पुस्तक म्हनै सबसूं आछी लागी। इणमें कविता री गहराई अर भावां रौ फूठरापौ नांमी है।

 

पदम मेहता : राजस्थांनी री नुवीं कविता अर नुवां कवियां रै बाबत आप कांईं सोचौ?

 

कन्हैयालाल :  म्हनै आ ई लागै के वै लोग अेक राजनीतिकवाद सूं प्रतिबद्ध होय’र लिखै, इण वास्तै वांरौ लेखण समग्र कोनी। वै समस्यावां उठावै, पण वां कनै समाधांन कोनी। तौ जिकौ साहित समाधांन नीं देय सकै, म्हैं उणनै जनहितकारी अर कल्यांणकारी कोनी मानूं।

 

पदम मेहता : राजस्थांनी भासा रै विकास सारू आज री हालतां में आप किण-किण भांत रा मारग सुझास्यौ?

 

कन्हैयालाल  : जीयां के ‘माणक’ रौ प्रकासण व्हियौ, तौ म्हैं इणनै राजस्थांनी भासा रै वास्तै अेक महताऊ घटना मानूं। वीयां म्हैं चाऊं के राजस्थांनी रौ पाठ्यक्रम होवै; अर राजस्थांन रा लोग-बाग ज्यादा सूं ज्यादा आपरी भासा में पत्र व्यवहार करै अर जठै-कठै ई होवै, राजस्थांनी भासा में ईं बातचीत करै, अर राजस्थांनी भासा में जिकी पत्र-पत्रिकावां छपै वांनै लेखण अर आरथिक रूप सूं पूरी मदद देवै।

 

पदम मेहता : कांईं आपां राजस्थांनी समाज नै अेक साबतौ अर संगठित समाज कैय सकां?

 

कन्हैयालाल : भाई, म्हैं तौ समझूं राजस्थान रा जिका लोगा है, वै बौत ई असाधारणता सूं भरियोड़ा लोग है, अर वांरी संस्क्रती, वांरी परम्परा अर वांरौ जीवण प्रेरित कर सकै हरेक समाज नै। अर आज राजस्थांन रा लोग सब प्रांतां में बिखरियोड़ा होवण रै बावजूद ई राजस्थांन रै नांव माथै वांरौ मानसिक संगठण है। वै कठै न कठै, दिमागी रूप सूं जरूर ई राजस्थांन सूं जुड़ियोड़ा है।

 

पदम मेहता : पण फेरूं ईं म्हनै तौ राजस्थांनी समाज रै संगठण अर जुड़वा में ढील-पोल लागै। आप देखौ,  इंगलैंड में पंजाबियां री पागड़ी माथै नांवेक पाबंदी लागी, तौ आखै पंजाब में रौळौ माचगौ, अर अठी उड़ीसा, बिहार अर कांईं ठा कितरा प्रांतां में राजस्थांनियां माथै अनाप-सनाप जुलम होयौ, तौ ई राजस्थांन रा लोगां में दावै ई जाग कोनी आई, क्यूं? वा कुणसी मजबूत कड़ी होय सकै, जिकी इण समाज नै जोड़ै?

 

कन्हैयालाल : इण समाज नै जोड़बा रै वास्तै सबसूं पैला तौ राजस्थांनी भासा ई अेक मजबूत जरियौ होय सकै। राजस्थांनी भासा रौ प्रचार करणौ पड़सी। वा ई समूचै राजस्थांन रा वासियां नै जोड़सी, दूजौ कोई साधन कोनी।

 

पदम मेहता : कांईं ‘माणक’ रै बाबत, के ‘माणक’ री मारफत, आप कोई खास बात कहबौ चास्यौ?

 

कन्हैयालाल : भाई म्हैं तौ चाऊं के ‘माणक’ आखै राजस्थांन में पढीजै। राजस्थांनी भासा रे वास्तै ‘माणक’ रौ प्रकासण घणी मोटी बात व्ही। राजस्थांन रा लोगां नै चाहिजै के वै इण पत्र नै अपणावै। इणी बात में आखै राजस्थांनी समाज अर राजस्थांनी भासा रौ भविस है।

 

असल में आपां, आपां री सांस्क्रतिक चेतणा गमाय दी। इणी वजै सूं आं 400 बरसां में आपां अेक ई जुगपुरुस कोनी देय सक्या। अर जिका प्रांत आपरी सांस्क्रतिक चेतणां रै समचै सावचेत रह्या; ज्यूं गुजरात, वै महात्मा गांधी दियौ, दयानन्द दियौ, पटेल दियौ। उत्तर प्रदेस अर बंगाल में ईं अेक सूं अेक टाळका आगीवांण अर जुग-पुरुस व्हिया। पण आपां रै कनै  म्हारांणा प्रताप अर दुरगादास रै पछै कुण, जिणनै आपां अखिल भारत स्तर रौ व्यक्तित्व बताय सकां? कारण औ ई व्हैगौ के आपां आपांरी सांस्कतिक चेतणा सूं कटगा। इणी वास्तै आपां रै समाज अर आपां रै प्रांत में मोटा मांनवियां रौ काल पड़गौ।

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थांनी मासिक) ,
  • सिरजक : कन्हैयालाल सूं पदम मेहता री बंतळ ,
  • संपादक : तेजसिंह जोधा ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाश ,
  • संस्करण : जून 1981
जुड़्योड़ा विसै