कवि पर बंतळ
राजस्थानी में अनेक भांत रौ साहित्य रच्यौ जावै श्री लक्ष्मीकान्त व्यास : राजस्थानी भाषा री सेवा करण री बात आप कियां सोची अर इण में आपरा प्रेरणा स्रोत कुण रह्या? नानूराम संस्कर्ता : म्हैं राजस्थानी भाषा री सेवा री बात कांई सोची। खुदरी भाषा तो मां
राजस्थानी तो अेक अभियान छै हाड़ौती अंचल रा राजस्थानी लेखक प्रेमजी प्रेम रौ जनम कोटा जिलै रै घघटावा गांव में 1 मार्च 1943 नै हुयौ। राजस्थान विश्वविद्यालय सूं आप हिन्दी अर अंगरेजी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि हासल कीवी। आजकल आप हाड़ौती साहित्य में
राजस्थानी सिमरिध भासा, इणरी पूंजी अथाग अंतररास्ट्रीय ख्यातीप्राप्त गुजराती रा सिरैनाम कवि, ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ विजेता, गुजरात विद्यापीठ रा भूतपूरव उपकुळपति, केन्द्रीय साहित्य अकादेमी रा वरतमांन अध्यक्ष अर राज्यसभा रा मौजूदा सदस्य उमासंकरजी जोसी साहित्य-जगत
राधाकिशन चांदवाणी : सबसूं पैला ‘माणक’ रै पाठकां नै आपरौ कीं परिचय दिरावौ? हरीश भादाणी : म्हारौ जनम बीकानेर में ब्राह्मण (भादाणी) परिवार में होयौ। अर म्हारी शिक्षा ई बीकानेर में हुई। सरूपोत री शिक्षा पूरी नीं कर सक्यौ। इणरौ कारण म्हारी घरू परिस्थितियां
ओ धन पाछौ हाथ नीं आवणौ है श्यामसुंदर भारती : राजस्थानी साहित्य, खासकर कविता कांनी आपरी रुचि किंयां होई? नारायणसिंह : राजस्थानी साहित्य कानी म्हारी रुचि रौ सब सूं बडौ कारण राजस्थानी संस्कृति सूं म्हारौ गैरौ लगाव है। म्हांरै गांव में जिकौ सांस्कृतिक
म्हारौ जलम 15 अप्रैल रै दिन जयपुर शहर में हुयौ। वठै री सरजमीं रै माथै ई म्हैं होस संभाळ्यौ। बठै गोडाळियां चालणौ सीख्यौ, अर बठै ई मां-पा-बा इत्याद सबद कैवणौ सीख्यौ। बठै ई पढ-लिख’र परवांन चढ्यौ। रथखांनै रै नजदीक हवाम्हैल रै सामनै री स्कूल में अंग्रेजी