घग्घर होज्यै म्हारी आंख्यां।

तूं जद भूलै म्हारी आंख्यां॥

थारै हाथां सूं छूटूं जद।

कळ-कळ बैवै म्हारी आंख्या॥

तूं जद आंख्यां साम्हीं आवै।

मूंडै बोलै म्हारी आंख्या॥

थारै शिव मन ऊपर कामी।

बाण चलावै म्हारी आंख्यां॥

थारै सुपनां री आहट बस।

नींद में सोज्यै म्हारी आंख्यां॥

थारै मन रै जंगळ मांय।

तितली ढूंढै म्हारी आंख्यां॥

स्रोत
  • पोथी : जागती जोत ,
  • सिरजक : सत्य पी. गंगानगर ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : जुलाई
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