आंगण में उग आया थापा थूर बचता रीज्यौ

बचता रीज्यौ हां-हां रोज हजूर बचता रीज्यौ

आज हथेळी में रक्हाल की आज क्यूं

ब्वार भायलां को चै खुल्यी कपूर बचता रीज्यौ

जतना मीठा होठ कड़ा उतना बचना

बरसां सूं यो कौ यो दस्तूर बचता रीज्यौ

दुख सांसां का सरणाटां कै पास छै

सुख नजर्‌यां न्हं पूगै जतनौ दूर बचता रीज्यौ

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : प्रेमजी प्रेम ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन ,
  • संस्करण : अगस्त 1986
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