तिरंगो तो फरकै आसमान
जागसी कद आपणलो देस?
जाग रे मिनखपणा, अब जाग
सामले आपो थारो जाग
चूस जावैली नीतर जोंक,
लाग जावैला नुंवी लाग
खोल कर सुणले अब तूं कान
मतां रह मोटी बुध री भैंस
भरी अन्न सूं भारी गोदाम
अन्न रा बधता जावै दाम
सुतंतरता आसी के अब काम?
आंतड़्यां रै चिप जासी चाम
भूख सूं मर री सगळी झ्यांन
करै नेतागण बैठ्या अैस।
नहीं म्हानै इसड़ी दरकार
नहीं चायै निकम्मी सिरकार
लगावै जो दोतरफी मार
पड़ैला इणसूं अब के पार
घणी जोखम में पटकी ज्यान
नुंवां नित बधता जावै कळेस।
सूंत रैया बाणीड़ा तन खून
कियां राखां अब बोलो मून
मचा राखी है सगळी सून
बधाता जावै खुद री दून
सुणावै नित सेवा रा गान
धार राख्यो नेताई भेस।
कागला बणग्या है अब मोर
बध्या है कित्ता मुनाफाखोर
सीस पर धोळी टोप्यां ओढ़
‘साय’ बणग्या है कितरा ‘चोर’
नेताजी बण देवै ग्यान
सुणावै है सांयत संदेश
राम, अब किण विध पड़सी पार
जीवणो बणग्यो खांडा-धार
मिनखपण खातो जावै हार
डाकण्यां पूतां नै ले मार
मिनस्टर तो औगण री खान
नेतिया आगै पड़ै न पेस
तिरंगा अब तूं हेटै देख
तळै के माच्यो है अंधेर
गवां री के बूझैला बात
बाजरो पाळण लाग्यो बैर
गयो कुणसै बिल मे सौ धान
बता के भूखो मरसी देस?