अेक अचंभो अजब गजबण! जिको कांई समझावै अे!

जाग्यां तू ओझळ हो जावै!

सोतां पाण प्रगट हो आवै!

कुणसा जादू-कामण जाणै?

बोल! कठीकर आवै अे?

मोरी-मोख्यां सजड़-जड़ी, आगळ-सावळ ठावी लागै!

बंद बारणा, म्हारै आगै, धण। कितरा पौरा लागै!

पण तू होठां मांय मुळकती,

कियां अठै आवै, पूगै?

बता किस्या जतनां सूं मुरवण!

मांवस नै चांदो ऊगै?

रूप अनोखा धार किता धण! रातां नै रंग जावै अे!

जाग्यां तू ओझळ हो आवै!

सोतां-पाण प्रगट हो आवै!

कुणसा जादू-कामण जाणै?

बोल! कठीकर आवै अे?

थारो आणो-जाणो लजवण! बायरियै सूं झीणो है!

संभागी सोवण री वेळा, वखत जागणो हीणो है!

जद जागूं में, म्हारै मन में,

जुग-जुग री तिरसा जागै!

तन रो ताव सिळगता धोरा,

मरुथळ-सो हिरदो लागै!

दो छिण जुड़ै मिलण रा मेळा, नींदड़ली जावै अे!

जाग्यां तू ओझळ हो जावै!

सोतां-पाण प्रगट हो आवै!

कुणसा जादू-कामण जाणै?

बोल! कठीकर आवै अे?

सिंसारी तो सगळी कैवै

अै सुपनां रा खेला है!

सुपनां में जीवणियां प्राणी, कितरा पागल-गैला है!

पण थारा सुपनां रै सुख में,

मैं जीवूं हूं, जागूं हूं!

जीवूं-जागूं, जद सांपड़तै,

निज नै पागल लागूं हूं!

नैण सिळावै सुपनां थारा, मन नै गीत सिळावै अे!

जाग्यां तू ओझळ हो जावै!

सोतां-पाण प्रगट हो आवै!

कुणसा जादू-कामण जाणै?

बोल! कठीकर आवै अे?

स्रोत
  • पोथी : मरवण तार बजा ,
  • सिरजक : किशोर कल्पनाकांत ,
  • प्रकाशक : कल्पनालोक प्रकाशन (रतनगढ़)
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