किस्यो चढ़्यो है रंग यो, किसी चढ़ी है भंग
च्यारूंमेर दीखबा लाग्यो थारो रूप अर रंग।
रूंख-रूंख में नूंवीं कूंपळ
गीत मिलण रो गावै
बाग़ां-बाग़ां काळा भंवरा
प्रीत रो रंग उडावै
गूंजै ढोलक ताल मृदंग, बालम जी रो चंग
च्यारूंमेर दीखबा लाग्यो थारो रूप अर रंग।
फागण लिखबा बैठी जद-जद
रस सूं भीज्या छंद
फीका सगळा पड़ गया
म्हारी पिचकारी रा रंग
रंग प्रीत रो अैड़ो बिखर्यो, हिवड़ै उठी तरंग
च्यारूंमेर दीखबा लाग्यो थारो रूप अर रंग।
तनड़ो भीज्यो मनड़ो भीज्यो
भीज्यो अंग-अंग
नैंण मिल्या जिण दिन नैंणां सूं
मैं तो रह गयी दंग
राम बणायां राखै नित, ओ थारो म्हारो संग
च्यारूंमेर दीखबा लाग्यो थारो रूप अर रंग।