बैरण बांसलड़ी रा बोल!

गया मरम में म्हारै उंडा

रस-विस दोन्यूं घोळ,

बैरण बांसलड़ी रा बोल!

अेक फूंक दी गयी भायली

मन बिनरावन डोल,

उफण बही जमना नैणा सूं

भीज्या कूल कपोल,

बैरण बांसलड़ी रा बोल!

खावै हेत हबोळा जाणै–

समदरियै री छोळ,

मोबी, किंयां सनेसो भेजूं

मैं तो हुई अबोल,

बैरण बांसलड़ी रा बोल!

सुध-बुध साव बिसरगी, लागी–

सहज समाधि अमोल,

मिली चेतणा चेतण स्यूं जा

द्वैत किंवाड़ी खोल,

बैरण बांसलड़ी रा बोल!

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : कन्हैयालाल सेठिया ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : सितम्बर, अंक 07
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