कायर नूं लानत दियै, सूरां नूं साबास।

रण अरियां नूं त्रास दै, चारण गुण री रास॥

कोई चारण-प्रेमी कहता है कि चारण वास्तव में गुण-निधि हैं। वे कायर को अपने प्राणों के मोह के लिए धिक्कारते हैं, देश-हितार्थ शूरवीरों की वीरता की प्रशंसा कर उन्हें उत्साहित करते हैं और युद्ध में शत्रुओं को संत्रस्त करते हैं।

स्रोत
  • पोथी : महियारिया सतसई (वीर सतसई) ,
  • सिरजक : नाथूसिंह महियारिया ,
  • संपादक : मोहनसिंह ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रन्थागार, जोधपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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