राजस्थानी री संदेश काव्य धार री अनूठी बात आ है क’ संदेश वाहक मानखै पर बार रा पंछी गोरी अर पीव रा संदेशा भुगतावै। कुरजां लोकगीत में विरहण कुरजां री पांखड़ल्यां माथै ओळमा लिखती झूरै—

 

कुरजां अे थे म्हारै बाप री
घड़ियक पांखड़ली निवाय
पांखड़ल्यां पर लिखूं अे धण
रा ओळमा
चांचड़ल्यां पर सरदा जुहार
कुरजां अे म्हानै भंवर
मिलाद्यौ अे!

 

कायर पूठ दिखायनै रण भोम सूं घरै आवै तो उण री पत्नी ओळमा री झड़ी लगावै। भगवान सूं भगत ओळमा सारतौ नी थकै। दूरांदूर सासरियै में, भाई रै आणै नै उडीकती, भात री बेळा जेज करतै बीरै नै बैन लाम्बा लाम्बा ओळमा देवै। ओळमा देवै सुसराली यातनावां सूं कोई पीड़ित बेटी आपरी जामण नै। परदेसां री कोई पीड़ित बेटी आपरी जामण नै। परदेसां री चाकरी चढिया फौजी पति नै ढोला री मरवण ओळमो देती झूरै, भांत भांत रा ओळमा ले जावै गिगन उड़ता सूटा-कुरजां पांखड़ल्यां पर मंड्या-ओळमा रा बोल राजस्थानी लोक काव्य में टीस ऊपनै। ओळमै री ओळ अणंत। उणरी पीड़ अथाह। लोकगीतां रौ तीखौ-चुभतौ ओळमौ सांभणियौ ही सांभै। ओळमै री परम्परा आदम। गुलामी में जकड़्योड़ै देस धणियां नै ओळमौ सरतौ कवि रौ सुर कदी मांदौ-मंदौ नी पड़ै, कविवर केसरी सिंह बारहठ समेत चारण कवियां री चेतावणियां रा चूंगट्यां ओटै सारीज्या ओळमा काळजै रै आर पार हुवै। ओळमौ परायां नैं नी, आपणां नै। काम बिगड़ै तो ओळमौ। कोई विश्वासघात करै तो उणनै ओळमौ। संसार भर रै जन जीवन में, क्रिया कलापां में, साहित्य धारावां में जद अपेक्षावां धरी रैय जावै तो ओळमौ देणै सूं कोई नी डटै राजस्थानी साहित्य री काव्यधारा में ओळमा-परम्परा बहु आयामी है। भाषा री तीख, भावां री ऊंड अर कथणगत मांयली मार रौ मरम, आपसी सम्बन्धां री मिठास साथै किणीनै देखणौ हुवै तो राजस्थानी लोक गीतां में झांकै। मीरां, चन्द्रसखी, रामनाथ कविया अर नव निधिकुमारी री भक्ति भाव भरपूर तीखा ताजा ओळमा सूं सैंपूर काव्य रूपां री छिब देख्यां ही जावौ। ओळमौ सारीजै, दिरीजै, काढीजै। ओळमौ झेलणौ पड़ै। आदमी कळपुरजी कोनी, मशीन कोनी। उण सूं भूल चूक हुवै ही। गफलत हुवै ही। तो, साथ संगेती, भाई सैण, सगा सम्बन्धी, समै माथै ओळमा सारै ही। ‘ओळमौ’ बैर भाव रौ नीं हेताहंदौ हुवै। ओळमौ जिकौ देवै बो सामलै बुरौ कदी नी चेतै। जे ओळमा नी सारीजै तो घर परिवार अर समाज री व्यवस्था री तीख भोटी पड़ जावै। तेज, प्रेम अर पीड़ा अे स्थायी भाव ओळमै रा। ओळमौ तानौ नी हुवै। मोसौ नी हुवै। ओळमै पूठै शब्दिक हिंसा रौ लाव लेस नी हुवै।

 

ओळमौ देवणियौ बदळौ नी काढ़ै। व्यक्तिगत अर समूहगत किणी भांत री भावना माथै किणी कारणै किणी सूं ठेस लागै तो उणरै नुकसाण रौ खमियाजौ जिकै नै भुगतणौ पड़ै उणीरौ जी जाणै।

 

राजस्थानी-ओळमा में इण प्रदेश री संस्कृति री सौरम अर सौरभ रो दरसाव राजस्थानी काव्य धारा में धारा प्रवाह प्रगटै।

 

राजस्थानी काव्य : ओळमै रा आयाम

 

राजस्थानी काव्य धारा रै अणंत प्रवाह में ‘ओळमै’ रा मोटामोटी दो आयाम हुवै—

 

1) लोक-काव्य धारा
2) जन-काव्य धारा

 

लोक है विराट मानखै समेट आखी जिया जूण रौ समग्र। इण रा गीत अनाम। कथा अनाम। लोक रचै। लोक सुणै। लोक भणै-गुणै। लोक हृदय रै मंथन, चिन्तन अर मनन पूठै जिका बोल आदम कंठां में रम्या, सुर-संगीत सध्या सदी दर सदी। पीढी दर पीढी।

 

जन है नांवधारी। थान-प्रधान। उणरा नाना चरित। नाना सुभाव। नाना सरूप। जन में कवि। भगत। वीर। संत। कलाकार। गुरु। राजा। रंक। जन है व्यक्ति। जन क्रूर। करूणामय। जन रचै। धुंस करै। जन ओळमा झेलै। ओळमा सारै। बोल चाल मे। कविता-रचना में।

 

लोक-ब्रहारूप। जन जीवै। जीवै मरै। इण जिया जूण में लोक अर जन अेक बीजै में रमै। इण रमत में, रंगत में ओळमै री ओळख सारां तो साधारण रूप में आपां मानवीय मनोविज्ञान रै दायरै में लोक अर जन रै ओळमै काव्य री आंतरिकता परखां पजोखां तो अेक तंतसार बात हाथ लागै क’ ओळमै री अभिव्यक्ति पूठै आपां मिनखाचारै रै व्यापक आयाम सूं जुड़ां। सीख सारां क’ कोई काम आपां इसौ नी करां क ओळमै आळी बात बणै। चूकां तो चेतां।

 

लोक काव्य धारा : गोरी रा ओळमा

 

राजस्थानी लोक काव्यधारा में ओळमा सारै झेलै नारी। बा नारी जिकी पीहर में पराई धरोहर रूप पळी। मां-बाप अर भाई-बैन्यां रै कडूम में, टाबरपणै में ब्याव हुंवता। आवागमन रा साधन अंवळा हा। अळघा सासरा। शाही चाकरी री नुंवै परणियै री रण भोम जातरा। विळसण री रुत जद ढोळौ (पति) बयीर हुंवतौ तो बरसां-बरस बाद पाछौ नी बावड़तौ। टाबरपणै सूं जवानी री देहळीज माथै पग धरती गोरी री विरह वाणी में आपरै ओळंगियै सरदार नै धण ओळमा देवै—

 

क्यूं परणिया ओ हजारी ढोला क्यूं परणिया
परण गमायौ म्हारौ रूप!
पिया तो परदेस। गोरी बांवळियै सूं बतळावै अर हियौ उभसांवती बोलै—

 

बांवळ्या अबकी तो ओळंग
साथीड़ा नै भेज
बांवळ्या अबकी चौमासौ भेळौ काढस्या
बांवळियौ ओळमै सूं डरतौ बोलै—
गोरी अे साथीड़ां री आमी सामी पोळ
ऊठ सवारै जाझा ओळमा!

 

राजस्थानी री संदेश-काव्य धारा री अनूठी बात है तो आ क’ संदेशवाहक मानखै-पर बार रा पंछी गोरी अर पिव रा संदेशा भुगतावै। ‘कुरजां’ लोकगीत में विरहण कुरजां री पांखड़ल्यां माथै ओळमा लिखती झूरै—

 

कुरजां अे थे म्हारै बाप री
घड़ियक पांखड़ली निवाय
पांखड़ल्यां पर लिखूं अे धण रा ओळमा
चांचड़ल्यां पर सरदा जुहार
कुरजां अे म्हांनै भंवर मिलाद्यौ अे...

कुरजां नै धरम बैन बणायर संदेसौ देवती नी थकै—

 

बीं लसकरियै नै जाय कही अे
क्यूं परणी थे मोय
परण पिराछित क्यूं लियौ जी
रह्या क्यूं नी अकन कुंवार
कंवारी नै वर तो घणा छा जी!

 

राजस्थानी रै इण जगनामी लोकगीत राजस्थान री परणी पांती नारी रै ओळमै पूठै उणरौ ओळमौ उणरै दबंग पणै नै उभारै।

 

इण कुरजां गीत री ढाल रा बीसूं गीत ‘पींपळी’ गीत री बानगी लो—

 

बाय चल्या छा भंवर जी पींपळी जी
हांजी ढोला होयगी घेर घुमेर
बैठण री रुत चाल्या चाकरीजी
परण चढ्या छा भंवरजी गोरड़ीजी
हांजी ढोला होयगी जोध जवान
विलसण री रुत चाल्या चाकरीजी

 

जवानी जोरां माथै। विरहण रौ जीवण अकारथ जाय। आं ओळमां में गोरी री मीठी रीस है, झूंझळ है, मिलण री आस है अर प्रकृति परिवेश गहरौ आत्मीय जुड़ाव।

 

साची बात है क’ ऊजड़ खेड़ा तो फेर बस जावै, निरधन भी धनी हुय सकै है पण गयौ जोबन पाछौ नी बावड़ै।

 

नारी रै काळजै रा विरही बोलां में जिका ओळमा सारीज्या है उणरी काव्य रसधारा आंकण जोग है। रीस भी, विनय भी। प्रायश्चित भी। प्रतीक्षा भी।

 

बेटी रा ओळमा

 

बेटी रौ बस चालै मां माथै। आस भाई माथै। मां तांई संदेशौ मोरियै रै हाथां पुगाती दूर सासरियै बैठी बेटी कळपती ओळमौ देवै—

 

जाई म्हारा मोरूड़ा म्हारी मावड़ी नै कीजै
धिया नै क्यूं दीनी मोटै रावळै
मोटा घरां बाप कंई करै—

 

म्हारी लाडेसर धीव दोसड़लौ मत देव
लेख तो लिख्योड़ा थारै छठी रात रा

 

बाप री दलील। परम्परा री आंधी ओळ सारै। मां माथै झाळ भरती बेटी ओळमो सारसी बोलै— दीनी क्यूं नी गुटकी भादरवै रै आक री मां, आंसूं ढळकती कैवै—

 

गुटकी अे लाडेसर धीव म्हारा सूं दियोड़ी नी जाय

 

पूतां सूं प्यारी धिया लागती

 

पूतां सूं प्यारी बेटी प्राचीन राजस्थानी समाज में कैवत में ही रैयी। सुसराली अत्याचार बहुवां माथै काल भी हा आज भी। तातौ बोल सुणौ बेटी रौ—

 

रातौ पीळौ रंग लाई म्हारी माय
सासरियै मत मैल म्हारी माय
सासरियै में सासूजी लड़ै
बिलोवणी करता बड़बड़ करै
साम्ही बोलूं तो झेरणा री घरै

 

बेटी नटै। सासरै मत भेज। पण बेटी पीहर कठै खटै? बेटी कुड़छी री मार खावै। झाड़बढ़ सूं घायल हुवै। ओळमौ तातौ हुवै सवाल चेतायां। सवाल नी तो समाधान नहीं। बेटी रै सवालां रा ओळमा सारौ—

 

सुण सुण अे म्हारी राता वई माय
दुखड़ां में क्यूं दीनी अेकली
दोरी दोरी अे माय
म्हारी पूतां नै पौसाळ
दोरौ धियां नै सासरौ
दोरौ दोरौ अे माय
म्हारी सासू नणद रौ साल
दोरौ कसोटौ देखणौ

 

मां लाचार। बेटी सेवै अत्याचार। अबै बारी भाई री। बैन, भाई नै उड़ीकै। जातरा बधतै नै ओळमा सारै—

 

ऊंचा गढा रा कांगरा रै वीरा
नीचा नै ढळता आंगणौ
जामण जाया बीर म्हारा रे
मिलतोड़ौ सिधाय
अेक टका री कांचळी रै
वीरौ टळियौ टळियौ जाय

 

बैन स्वासणी तो लेवाळ! भाई कनै कोई जबाब कोनी। अेकर भाई बैन रै घरै ढूक्यौ। चावळ मूंगांरी खींचड़ी जिमांवती आपरी लड़ाभार सासू रै ओळमै सूं डरपती बोली—

 

वीरा वेगौ वेगौ जीमी रे
म्हारी सासू नणद लड़ोकली
वीरा मनै देवैला गाळियां
थनै जाझा ओळमा

 

भाई नै भात नूतण नै बैन पीहर जावै। भौजाई उणरै भाई नै लुका देवै अर कैवै भतीजां नै नूंत लै तो बैन ओळमौ फटकारती बोलै—

 

भतीजा भेजीजै भलांई मोकळा
भाई री ठौड़ भाई ओपसी

 

भात नूतण वीरै नै झूरै बैनडी ऊमण-दूमणी ओळमौ बधै। बीरौ किंया ई बैन कनै उणरै सासरै ढूकै तो बैन ओळमौ सारै—

 

सब रस गैणा लाया म्हारा वीरा जी
अेक उघाड़ी चिट्टी आंगळी!

भाई री भीड़ चढती बैन आपरी भौजाई नै ओळ मावै—

 

बाईसा गैणा तो घड़ावै म्हारा वीर
के बरजै नकटा नणदोई
बाई सा के तो म्हारै सायबजी नै समझाव
के नई तर म्हारै घरै जाव

 

हार हूर नणद नै बात मानणी पड़ी। आपरै पति नै रोकड़ ओळमौ सारती धण बोली—

 

सुणोजी सुणोजी ओ म्हारी सगी नणद रा वीर
ओ कै? भोजायां देवै ओळमा जी

 

राजस्थानी लोक काव्य धारा रौ ऊंडौ मनन करां तो ठा पड़ै क’ अत्याचार पीड़ित राजस्थानी नारी आपरी ताती झाळ काळजै री ओळ्यां रै मिस ही सारी है।

 

राजस्थानी भाषा रा घणकरा लोक गीतां रौ आधार सामाजिक परिवेश में सामन्ती है, आम जन री दोरफ तो आं ढोला-मरवण सार रा गीतां सूं बेसी होणी चावै। अेक आम जन री नारी पीड़ा रा बोल सुणौ—

 

सासूड़ी रा ताजणा सा ओळमा
भायां रै लाखा रै लेखण सारू अे मांय
किण गत सैवूं सैलंग झूरती

 

जन काव्य धारा ओळमै रौ ओज

 

वीर पत्नी आपरै कायर पति नै ओळमा सारै—

 

दुसमण देसां लूटकर ले जावै परदेस
राजन चुड़ल्यां पैर लो, धरो जनानो भेस
दूध लजायो माय रौ, कीन्हो देस गुलाम
के सलाम खुद झेलता, ऊभा करो सलाम
विस खावो, के सरण लो, सरवरियांरी थाह
के कंठां बिच घाल लो, घाघरियां री घाह
यो सुवाग खारो लगै, जद कायर भरतार
रंडायो लागै भलो, होय सूर सरदार

महाकवि सूर्यमल्ल, नाथूदान महियारिया, शंकरदान सामौर अर केशरीसिंह बारहठ रै वीर काव्य में ओळमा सारीज्या है देश री स्वाधीनता सारू। लोक चेतना सूं पूरंपूर अै ओळमा घणा धारदार है। सूर्यमल्ल रै ओळमा रा कीं दूहा—

 

मूंछ न तोड़ो कोट में, कठियां छोड़ै काळ
काळां घर चेजो करै, मूसा पण मूंछाळ
यो गहणो यो बेस अब, कीजै धारण कंत
हूं जोगण किण काम री, चूड़ाखरच मिटंत

 

अंग्रेजां सूं देश मुक्ति री ओळ सारता शंकरदान सामौर राजतंत्र री डोफापणी पर ओळमै रौ आंकुस री मारै।

 

सन् 1847 री आजादी री जूझ री टेम तत्कालीन बीकानेर नरेश श्री सरदारसिंह नै अंग्रेज सरकार री तरफदारी करण रै कारण श्री शंकरदान सामौर ओळमौ दियौ—

 

देख लड़ै हित देस रै, पेख सचा रजपूत
सरदारा तोने सदा, कहसी जगत कपूत

 

कवि आपरै समै रौ पहरैदार हुवै। महाराणा फतेहसिंह दिल्ली दरबार में पधारणै री पहल सारी तो बारहठ केशरीसिंह उणा नै चेतावणी रा चूंटिया लिख भेज्या। चूंटिया हंदा ओळमा फळकारी हुया। कीं ओळमा-दूहा पेश है—

 

घण घल्या घमसाण, राण सदा रहिया निडर
पेखंतां फुरभाण, हलचल किम फत मल हुवै
अवरां नै आसान, हाकां हरबल हालणौ
किम हालै कुलराण, हरबळ शाहां हांकिया
सकल चढावै सीस, दान धरम जिणरौ दियौ
सो खिताब बखसीस, लेवण किम ललचावसी

 

इण बरगा सोरठां री चुभन रौ फळ? इतिहास साखी है महाराणा दिल्ली दरबार में नी ढूक्या।

 

महाराणा प्रताप नै महाकवि पृथ्वीराज जिका दूहा लिख उणारै सत नै सदा सिरै राख्यौ उण परम्परा मे जिकी काव्य धारा राजस्थानी साहित्य में सरीजी है उण रै ओळमै रा आंक घणा ताजा, तीखा, असरकारी नै आर पार दीसै।

 

देशी रजवाड़ां में तड़फती दुखियारी जनता रौ पख लेंवतै थकै कवि श्री यशकरण चारण रौ अेक ओळमियौ सारठौ—

 

फिरग्या रै बळ फूल, रहै नचीता रात दिन 
भूपतियां री भूल, जाणी छेवट जावसी

 

ओळमै रौ दायरौ जद चेतावणी तांई पूगै कवि रै चूंटिया रै पाण चढै तो समै धिन हुवै इस्या काव्य सुर सुण’र।

 

भगतां रा ओळमा

 

मीरां बाई, चन्द्रसखी रामनाथ कविया अर श्रीमती नवनिधिकुमारी आपरै भजनां, दूहां, गीत नाट्यां अर काव्य सरूपां में नटवर नागर नै जिका ओळमा दिया है बांरी छिव अनूठी है।

 

गिरधर नागर रै नांव मीरां रौ ओळमो भाळौ—

 

जाबा दे री जाबा दे, जोगी किसका मीत
सदा उदासी मोरी सजनी, निपट अटपटी रीत
बोलत वचन मधुर से मीठे, जोरत नांही प्रीत
हूं जाणूं या पार निभेगी, छोड चल्या अधबीच
मीरां कहै प्रभु गिरधरनागर, प्रेमपियारा मीत

 

मीरां रै इण ओळमै री धार तीखी करतौ अेक और पद—

 

राणाजी थांरो देसड़लो रंग रूड़ो
थांरै मुलक में भक्ति नहीं छै, लोग बसै सब कूड़ो
पारट पटम्बर सब ही त्यागा, सिर बांध्यो छै जूड़ो
माणक मोती सब मैं त्याग्या, तजदियो करको चूड़ो
मेवा मिसरी सब मैं त्याग्या, त्याग्यौ शक्कर बूरो
तन की आस कबू नी कीनी, ज्यूं रणमांही शूरो
मीरां के प्रभु गिरधरनागर, बर पायो मैं पूरो
मीरां रै आं ओळ्गां पूठै काव्यरौ तपतेज मनन जोग है।

 

कृष्ण भक्त कवि चन्द्रसखी रै नाट्य गीत में कान्हूड़ै रै नांव ओळमै री छटा देखौ—जसोदा जण-जण रा ओळमां सूं उथपती कैवै—

 

धाई रै कान्हूड़ा तेरा ओळ्मा रै राम!
घर तेरे माखण, घर तेंरे महिड़ो
घर तेरे घिरत घणेरो मेरा लाल
अैसो रे पितळायै, साखण क्यूं, खायो रे राम!
घर तेरे राधा, घर तेरे रुकमण
घर तेरे सीता जी सी नार मेरा लाल
अैसी रे मस्तानी गूजरी, क्यूं छेड़ी रे राम
चन्द्र सखी भज बालकृष्ण छवि
हरख निरख गुण गावूं मेरा राम

 

कविवर रामनाथ कविया री ‘द्रौपदी विनय’ रा दो दूहा, राजस्थानी ओळमा काव्य री अमर निध है।

 

गज नै ग्रहियौ ग्राह, तें सहाय हुय तारियो
बारी मो बैराह, बैठो क्यूं वसुदेव रा

पहला केस खिंचायकर, पछै बधायो चीर
आयो लाज लुटाय कर, आखर जात अहीर

 

इण आलेख पूठै पैली बार राजस्थानी री भक्त काव्य साधिका, कृष्ण आराधिकां श्रीमती नवनिधि कुमार री ‘आर्त आहें’ नावरी रचना रा तीन सोरठा प्रस्तुत करूं—

 

दीनी खूब दिखाय, द्रुपद सुता ऊपर दया
बजर हियो न बणाय, म्हारी वखत मुरारिया
दुक मे दीनानाथ, कुण थारा बिन करग है
घेरी दुखड़ै घोर, आह सुणै, आवै नही!
भूरि भयंकर रोग रा, बाज रह्या सिरबंब
नवनिधी रै नटवर बिना, अवर नहीं अवलंब

 

जोबनेर ठाकुर श्री नरेन्द्रसिंह जी री बैन
श्रीमती नवनिधि कुमारी री आ काव्य धारा आज तांई अंधारै में है।

 

राजस्थानी काव्य रै महा प्रवाह मांय सूं ओळमा री ओळ सारतै थकै अेक बात निजरै आई क’ इण पख पूठै राजस्थानी कविता री शोध किणी री निजर कोनी गई। पण इण आलेख में राजस्थानी काव्य री सिलसिलैवार शोध सूं इण धारा रा घणकरा उपेक्षित पक्ष सामी आया है।

 

आम जण किणी ताकत सूं नी दबै। भगवान सूं भी नीं। अेक लोक भजन रा बोलां साथै औ लेख पूरणौ चावूं—

 

भक्तां रै क्यूं नी आयो रे
संता रै क्यूं नी आयो रे
ओ रे म्हारा नटवर नागरिया
मीरां कंई थारै मासी लागै
ज्यांरा मान वधायौ रे
करमा कंई थारै काकी लागै
ज्यांरा खीचड़ खायौ रै...

 

भजन लम्बौ है। पण जन भक्त कवि री दीवानगी देखौ कांई गजब रा ओळमा नटवर नागर रै नांव सार्‌या है।

 

हर समै में लोग भूलै पड़सी चूकसी। ओळमा सारता कवि चेतावता रैसी उणानै। राजस्थानी काव्य री आ धारा अणंत है अर रैसी।

स्रोत
  • पोथी : माणक पारिवारिक राजस्थानी मासिक ,
  • सिरजक : ओंकारश्री ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन ,
  • संस्करण : फरवरी 1989
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