दीवाळी रौ तिंवार घणा जूना-जूना तिंवारां में सूं अेक है। कोई कैवै रामचंदरजी लंका जीत’र अजोध्या पधार्या जद परजा दीवा जोय-जोय वां रा बधावणा कर्या, कोई कैवै लिछमीजी री आराधना आज रै दिन कर्यां लिछमीजी अन-धन सूं घर पूर दैवै। आपणै पुराणां में कह्योड़ी महारात्रियां में सूं अेक महारात्री या काती री काळी अमावस है, जो करोड़ां दीयां सूं सज’र सोना री बणी मुळकै। भगवांन री विचित्तर लीला है। पनरा दिनां पैली तौ सरद पूनम, दूध सरीखी ऊजळी, चांनणै री बरखा करती, रूपौ उछाळती रात अर पनरा दिनां पछै ई या अमावस री घोर काळी महारात्री। दीवाळी आपणै आखै देस में मनाईजै। हिमाळै री चोट्यां सूं लगा’र महोदधि अर रतनागर अर सागर री उछाळां सूं भींजता लगा घरां तक दीवाळी रा दीवा जुपै। दरिद्र सूं दरिद्र रै घर में ईं, गहरा जंगळां में रैण वाळा किरातां री झूपड़ियां में ईं आज रै दिन और कांईं नीं तौ अेक दीवौ तौ टम-टम करै ई।
यूं तौ दीवाळी रौ तिंवार मनाबा री भूमिका दसरावां सूं बणणै लाग जावै। आपणै राजस्थांन में सदियां तांईं बारला आकमणां सूं रक्षा करता रैणै अर लड़ता रैणै सूं सैनिक परंपरा, तिंवारां में अर संस्कति में ईं ऊंडी बैठगी। दसरावा रा दिनां में सैनिक उच्छब राज्यां री राजधानियां में होता रैता। लोग यां में भेळा हुवण नै जाता। यां नै दसरावा पर रण सिक्षा लेवण नै जाती बैळा री विदा घणा उछाह अर मांन सं दी जाती। घर सूं निकळती बेळा लुगायां भेळी हो गाती-गाती सीख देती। सुहागण हाथ सूं दही अर गुड़ री डळी मूंडै में देती गावती-गावती दीवाळी पै पाछा घरै आणै री पक्की करा लेती—“कांईं दसरावा रौ मुजरौ, दीवाळी घर री करजौ जी ढोला।''
टाबर दसरावा सूं ईं आपणौ ‘घड़ल्यौ’ सिणगारबा लाग जावै। माटी रौ बण्यौ छोटौ-सो ‘घड़ल्यौ’, जीं पर कुम्हार घणी कारीगरी सूं चतरांम कर दै अर झीणी-झीणी जाळ्यां कोर दै, वीं रै मांय नै रात पड़्या दीयौ जोय दै। कुंवारी कन्यावां रौ यौ तिंवार दसरावा सूं दीवाळी तक चालै। टाबरियां रौ झुंड रौ झुंड ईं ‘घड़ल्या’ नै माथै मेल, जीं री जाळियां में सूं दीवाळी री मुळक रौ चांनणौ छिटकबौ करै, अेक घर सूं दूजै घरै जाती रैवै। छोटी-छोटी टाबर्यां, जां रा भोळा-भोळा मूंडा, आंख्यां में लाज अर स्नेह भर्यां, बड़ी लुगायां ज्यां ठावी बणणै रौ अभिनय करती लगी घरां-घरां में जाय मीठा-मीठा साद सूं, बाळपणौ जतावती गाबा लागै—‘घड़ल्यौ म्हारौ लाडलौ, सैर में भाग्यौ जाय रे।’ मां रौ कवळौ काळजौ राखण आळी लुगायां री छाती में दूध उतर आवै। वै टाबर्यां नै घरा में बैठाय वां रा दीवां में तेल घालै, पीसौ देवै अर मिठाई खुवावै। छोरियां राजी व्है-व्है उछाह सूं गीत गावै। मांवां रा मनां में गरगाळियां पड़ै। भोळी-भोळी बोली में मन री चाहना गाय’र सुणाय दै—‘छोरा मांगै चकरी-भंवरा, छोर्यां मांगै ढूल्यां हो राज।’ लारै री लारै चाहना पूरी होणै रौ मायतां री ओर सूं हुकम भी वै ई सुणाय दै—‘यै लो, छोरां चकरी-भवरां; यै लो छोर्यां, ढूळ्यां ओ राज।’ अंधारी रात में ‘धड़ल्यां’ री जाळियां में सूं छण-छण’र उजाळौ वां हंसती-मुळकती छोरियां रै आहलाद सूं चमकता मूंडां पर पड़ै जद यूं लागै जांणै पवित्रता तम रै पड़दै नै दूरौ कर, मुट्ठयां भर-भर जाळी में सूं आणंद उछाळरी है।
दीवाळी ज्यूं-ज्यूं नजीक आवै, घर-लिछम्यां रै कांम री बोझ्यौ बधतौ जावै। लिछमीजी पधारै तौ वां रौ स्वागत भी तौ करवा नै घर-लिछमियां री आगळ्यां रै टांचा ई बिस्सा ई गहरा पड जावै। श्रीमंतां रा घरां में गैणां री पेट्यां खुल’र सफाई होण लागै। सोना-चांदी रा ढिगला री पूजा कर सायद वै लिछमीजी नै वीं घर में आणै रौ प्रलोभन देवै के अठै आयां थारी इसी पूजा होवैला।
धनतेरस आवै, रूप चवदस आवै। सूरज ऊग्यां पैलां-पैलां ईं सनांन कर सारौ सिणगार करलै, रूप चवदस पै भरोसौ है के वा रूप बांटती आवै। दीवाळी री रात आतां-आतां तौ सोना री लंका बस जावै। जठी नै झांकौ जटी नै दीवां री पांता री पांतां चम-चम करै। घर-घर में लिछमीजी री पूजा गाजा-बाजा सूं होण लागै। लिछमीजी रै मूंडागै झोळ्यां मांड-मांड, और देवी-देवतावां रै आगै तौ रांम जांणै पर लिछमीजी रै मूंडागै तौ साचांणी सांचै मन सूं प्रार्थना करै—“हे लिछमीजी म्हाराज, म्हारै घर में पधारजौ।” छोर्यां घड़ल्यां में दीवौ जोय प्रदर्शन करै तौ छोरा पाछै क्यूं रह जावै। वै दीवाली रै थोड़ा दिनां पैलां सूं ईं अेक मोटा सारा दीवा में कपास्या भर खूब तेल सूं सींच सिळगादै। दीवां नै सांठा में बांध लांबी डांडी बणावै। कपास्या धपड़-धपड़ सिळगबौ करै। छोरां रौ टोळौ रौ टोळौ गातां-कूदतां घरां-घरां में ‘हीड़’ सिंचाबा नै जावै। वै छोर्यां री नांईं मीठा-मीठा गाय’र दीवौ नीं पूरावै। वै तौ गावै तौ ई धूंस जमाता लगा गावता आवै—“हीड़ सींचौ तेल घालौ, तेल नीं घालौ तौ रावळै चालौ।” मांवां-जैनां मुळकती लगी ‘तेल ले लौ भाई, रावळै मत ले जाऔ’ कैवती हीड़ में खूब तेल पूर दै, हाथ में नाळेर झळाय दै, मूंडा में मिठाई भर छोरां नै सीख दै। बानरी सेना ईं घर सूं वीं घर दौड़ती रैवै। दीवाळी रै दिन तांईं छोर्यां ‘घड़ल्यौ’ फेर अर पीसा चोखा भेळा कर लै।
दीवाळी री सांझ रा लुगायां-टाबर आप-आप रा चोखा बसतर पैर्यां घरां री छातां पै दीवा जोबा लाग जावै। तेल पूरता जावै, दीवा जोवता चालै। दीवो बुझै, पाछौ जोवै। थाळी में घणा सारा दीवा जोय छात रै माथै दीवा जमाबा नै अठीनै-उठीनै फिरै। वां दीवां रै मद परगास में हालती चालती घर लिछमियां अर उमंग सूं कूदता टाबर देख’र यूं, लागै के सांचाई लिछमीजी आय रिया है। खास कर तौ पांणी रै मांय नै अर किनारै पै बणियोड़ा मंदरां अर मकानां पै और ई दीवा घणा जोवै। पांणी में पड़तौ लगौ दीवां रौ परतबंब मन मोय लेवै, जांणै पांणी में चितरांम कोर दियौ व्है। ऊपर आकास में असंख तारां नै ईं रात में आपणै सूं ईं बेसी नीचै धरातळ पै तारा नै देख दो घड़ी ईसकौ व्हे जावै।
दीवा मुळकता रैवै। पूरबा आळा हंस-हंस तेल पूरता रैवै। बळबा आळा पतंगा बळता रैवै।
दिनूगै उठ’र देखै, रात नै दप-दप दमकणियां दीवां री ओळ बुझी पड़ी, बळ्या लगा पतंगां रा ढिगला परगास रै साथ दीवा री बाती भी बळी। नीं तेल रयौ, नी परगास। दार्शनिक मन, माटी रा दीवां नै देखतौ-देखतौ गुम हो जावै। यै ऊंधा पड़िया दीवां, जीवण रौ अेक मोटौ रहस समझायदै। पतंगा रा ढिगला प्रेम मारग री विकटता रौ नकसौ मूंडागै मेल दै। काचा प्रेमी कांन पकड़लै, सांचां रै आगै अेक नवौ गेलौ खुल जावै।
दीवाळी रौ परभात खेंखरौ व्है जावै। गोरधन पूजा ई कैवै अर खेंखरौ ई कैवै। गोबर रा गोरधन घाल-घाल घर-घर पूजा होण लागै। आज रौ दिन गायां री अर बळदा री पूजा व्हेण रौ। परभातै गायां री पूजा व्है, सांझ रै बळदां री। गायां अर बळदां री पूजा ई वाजब। यां रै जोर पै तौ यौ सारौ दीवाळी रौ तिंवार मनावणी में आवै। घरां में जो अन्न रा ढिगला पड़्या है, तेल रा कूंपा पड़्या है, घी-गुड़ रौ भंडार भर्यौ है, वौ सगळौ यां बळदां अर करसां लोही-पसीनौ अेक कर्यौ, जद कमावणी आयौ। अबै बीं कमाई नै घरां में घाल दीवाळी मनाई तो बळदां री पूजा रौ हक तौ पैलां। खेंखरा रै दिन ऊगतां ईं टाबर हरणी गाबा लाग जावै। आपणै हाथां सूं करियोड़ी कमाई पर अंजस कींनै कोनी होवै? वीं री करियोड़ी कमाई रौ वरणण जवांन हरणी गाय-गाय’र झूम-झूम’र करै—“हरणी, हरणी, तूं क्यूं दूबळी! चाल म्हारै देस। काठा गिहुवां री घूघरी धरी, धोळी तिली रौ तेल।” हाथां री कमायोड़ी मोटा-मोटा कणां री मक्की नीपजी है, घर में पीसण वाळी पातळी है। और कांईं चावै?
“धरती माता घणी नीपजी रै, भोळी मक्की रौ ठाट। पीसण बाळी भाई पातळी रे, घट्टी घमोड़ा खाया।” आखै दिन ईं तरै सूं हरणी गावै। सांझ पड़्यां करसा आप-आपरा बळदां नै ले’र रावळै पूजा कराबा नै चालै। लखारा कना सूं बळदां रा सींग भांत-भांत रा रंगां सूं रंगायलै अर रंग रा थापा बळदां रा मोरां पै मांड दै। अेक हाथ में बळद री नाथ थाम्या, दूजा हाथ में कांन तांईं ऊंची लाठी लियां कांधा पै कंबळौ नांख्यां मस्त हुया हुरणी गावता आवै। जीं रौ बळद जितरौ ताजौ अर मच्यौ लागौ है। जितरी ई घर-धणी रै मन में मस्ती व्है। बळदां री पूजा देखण नै सारौ मेळौ व्है जावै। पैलां बळदां री पूजा व्है, लापसी खुवावै, उठीनै पूजा व्है जितरै तौ वां री नाथां पकड़्यां रोक्यौ राखै। पूजा होणै रै पछै टाळमा सांडां नै लड़वा नै छोड़ दै। लाठ्यां हाथां में पकड़्यां जवांन सावचेत व्है खड़्या व्है जावै।
पछै सांडां री भिड़ंत हुवै, जां सांडां री लड़ाई देखी है, वै जांणै के यां री लड़ाई कितरी जोरदार अर मजैदार हुया करै। दो ना’रां री लड़ाई में ईं इतरौ आणंद देखण वाळां नै नीं आवै, जितरौ सांडां री लड़ाई में। सारौ गांव भेळौ व्है यां रौ द्वंद्व देखै। ईं युद्ध रा चैम्पियन रा घर-धणी नै पागड़ी बंधाय सीख दे।