च्यारूं मेर मखमली बेकळू रेत रौ पसराव। राजस्थान में जैसलमेर रै बाद रेत रै टीबां रै फिलमांकन रौ दूसरौ खास मुकाम श्रीडूंगरगढ चूरू जिलै रौ अेक कस्बौ। ठीक वां दिनां, जदकै मृणाल सेन फ्रांस रै सैयोग सूं जैसलमेर रै कुलधारा गांव में आपरै लाव-लश्कर रै साथै ‘जेनेसिस’ जिस्यी महत्वाकांक्षी फिलम री शूटिंग कर रैया हा—श्रीडूंगरगढ में ‘दामुल’ सूं जगचावा फिलमकार प्रकाश झा अेक अनोखी लोककथा पर आपरी नवी फिलम रै निरमाण सूं जूझ रैया हा। जूझणौ इण वास्तै के ‘जेनेसिस’ जठै करोडूं रुपियां री लागत अर जबरदस्त आयातित तकनीक सूं बण रैयी ही, बठै प्रकाश झा ‘परिणति’ में अणूतै सीमित बजट मांय वो कीं कर दिखावणी चावै हा, जकौ वां ‘दामुल’ में कर दिखायौ हौ।

‘परिणति’ सूं पैली व्यावसायिक फिलम निरमातावां में सूं अेक सूं अेक बडा नाम आं धोरां नै परदै माथै दिखाय चुक्या है। पण इण बार, इण फिलम री पूरी निरमाण प्रकिया में साथै रैवण रै बाद कैवणौ अतिशयोक्ति नीं लागै के अनूठौ हुवैला इण बार परदै माथै आपणौ राजस्थान। लगै-टगै सौ मिनट री इण फिलम री कहाणी संगीत, परिवेश, पात्रां री वेशभूषा अर संवाद—सै कीं राजस्थानी रंग में रंग्या नजर आसी। हिन्दी साहित्य में आपरी राजस्थानी अनूदित लोककथावां सूं चावा-चहेता हुया लेखक विजयदान देथा री अेक कहाणी ‘नूंवौ-जलम’ पर आधारित इण फिलम सारू जरूरी हौ के सै कीं लेखक री कल्पना अर अभिप्रायां नै मुखर कर सकै। इस्यौ तद संभव हौ जद कहाणी में अपरतख ढंग में पोईज्यै राजस्थानी जीवण रै अेक खास काळखंड नै सजीव कर्‌यौ जा सकै।

‘परिणति’ रौ थोड़ै में कथानक इण भांत है—

किणी बखत अेक कुम्हार आपरी कुम्हारी अर टाबर रै सागै, आपरी म्हैनत रै सुफळ सूं नित-नवा माटी रा भांडा बणावतौ, बेचतौ अर भरपेट खा’र सुख री नींद सूवतौ। समै बीत्यौ, वीं रौ बेटौ दस-बारै बरस रौ हुयौ। रीत रै मुजब कुम्हार उणरौ ब्याव रचायौ अर बीनणी नै आणै री रस्म तांई पीहर छोड़ दियौ।

कुम्हार री नेकनामी चालतां-चालतां अेक नगरसेठ तांई पूगी। अठै तांई के सेठ खुद चला’र कुम्हार रै कनै पूग्यौ। घणी मिन्नतां-मनौतियां रै बाद सेठ संतान रौ मूंडौ देख्यौ हौ, सो वो कोई पुण्य रौ काम करणौ चावै हौ। पुण्य-रौ-पुण्य अर नाम-रौ-नाम। पण सेठ नै आपरै सिवाय किणी माथै भरोसौ नीं हुवतौ हौ। कुम्हार सूं मिल’र उणरौ वैम जावतौ रैयौ। सेठ कुम्हार रै आगै प्रस्ताव मेल्यौ के वो दूर रेगिस्तान में बटाउवां सारू अेक सराय बणवावणी चावै, जिणनै वो परिवार समेत वठै बस’र संभाळै। कुम्हार आपरौ घर, आपरी चाक अर आपरौ हुनर छोड’र दूर जावण में ना-नुकुर करी, तो सेठ अेक सूं बढ’र अेक फंदा फेंकिया। सेवट कुम्हार परिवार समेत वठै जा’र बसण सारू राजी हुयग्यौ। सेठ आनन-फानन में अेक पक्की सराय अर कुम्हार रै रैवण सारू कनै अेक घर बणवाय दियौ।

कुम्हार आया-गया बटाउवां री पूरै मन सूं सेवा करतौ। वीं रै कनै पूग’र थाका-थूका बटाऊ सुख री छींया में कीं सांसां लेवता अर कुम्हार रै परिवार नै भरपूर आसीसां दे’र आपरै रस्तै रवानै हुवता। तद ई, अेक दिन अेक साहूकार आपरी सेठाणी अर दो जवान बेटां रै साथै सराय में पूगौ। रस्तै में बीमार पड़ण सूं सेठाणी मरूं-मरूं हालत में हुय चुकी ही। सेठ रा सगा बेटा वौपार में घाटै री कल्पना कर’र मां नै मरतां छोड’र गया परा। कुम्हार रै बेटे सेठाणी री वा सेवा करी के वा अेकदम भली-चंगी हुयगी, कपूत बेटां रै वैवार सूं दुख सेठाणी कुम्हार रै बेटै नै आपरौ बेटौ बणा’र साथै ले जावण री बात करी। कुम्हार-कुम्हारी नै तो इणरी कल्पना करणी कठण ही के इकलौतै बेटै नै अपणै सूं आगौ करै। सेठ-सेठाणी समझायौ के क्यूं आपरै लाडलै रै भाग्य रै आडै भींत बण’र ऊभा हौ! बेटै रै नगर सेठ बणण रै सपनै रै घेरै में आ’र कुम्हार-कुम्हारी आपरी ममताळू छाती अर भाटौ राखणौ कबूल कर्‌यौ अर इण भांत उणांरौ इकलौतौ बेटौ बारै बरसां सारू उणां री आंख्यां सूं दूर निकळग्यौ।

बरस बीतण लाग्या। ममता री मारी कुम्हारी बेटै रै आवण रा दिन गिणती। रोज सूरज निकळतां वा आपरै घर री भींत पर गेरू माटी सूं अेक लींगटी मांड देवली अर आं लींगटियां नै वा रोज-रोज गिणती। अेक दिन कुम्हार अर कुम्हारी नै बात-बात में अैसास सालै के आखिर धन रै लोभ में तो वां आपरी आंख्यां रै तारै नै आंख्यां सूं दूर कर्‌यौ है। अेक चिणग-सी सुळगै दोनां रै मनां मांय। कित्तौ-कित्तौ धन तो खुद चाल’र उणां रै दरवाजै पूगै है। मंजूषां में भर्‌यां हीरा-जवाहरात अर सोना-चांदी लियां कित्ता बटाउवां नै तो वां खुद सही-सलामत विदा कर्‌या है। जे धन उणा रौ हुय जावै, तो कांई बेटै नै बेगौ नीं बुलायौ जा सकै? इणरी कोई तरकीब हुय सकै?

उणी रात, गैणां-गांठां सूं लड़ाझूम आपरी जवान सेठाणी नै ले’र, घर सूं छानै तीरथ नै निकळ्यौ अेक सजीलौ सेठ पूगै। सराय में रातवासौ करै दोनूं। चाक पर नित-नवा बरतन घड़’र, सुख-सांयती सूं खीच खा’र, ठंडौ पाणी पी’र लखमोली नींद सूवण वाळा कुम्हार-कुम्हारी किण फैसलै पर पूग्या? दोनूं मिल’र तीरथ नै निकळ्या सेठ-सेठाणी नै सीधा सुरग तो भेज्या ई, वां री गाडी अर बळद तकात नै रेत रै दळदळ में फेंक आया।

उण दिन सूं सराय रौ तैखानौ हीरां-जवाहरातां अर सोनै-चांदी सू भरण लागौ। धन री लाळसा में आंधा हुयोड़ा कुम्हार-कुम्हारी मुड़’र नीं देख्या। नीं तो वां नै बेटौ याद आयौ, नीं बीनणी। हुवतां-हुवतां बारै बरस हुयग्या। गैरौ तैखानौ फकत अेक आंगळ खाली हौ। अर अेक दिन बडी-बडी मंजूषां में अणमाप धन-दौलत रै साथै अेक नौजवान सराय में पूग्यौ। उण रै पैलड़ी रात कुम्हार-कुम्हारी री आत्मा में थोड़ी हरकत हुई ही अर वां अब औरूं हत्यावां नीं करण रौ फैसलौ कर लियौ हौ। पण नौजवान सेठ मूरखता करी के बातां-बातां में आपरा मंजूष खोल’र उणां नै दिखाय दिया। दोनां री आंख्यां रै आगै मार्‌यां चकाचौंध रै अंधारौ छायग्यौ। उण रात वां आपरौ फैसलौ फकत अेक दिन सारू टाळ दियौ। परभात हुयौ, तो नौजवान सेठ रौ कीं अतौ-पतौ नीं हौ। उणरी सारी दौलत तैखानै रै ऊपर तांई लबालब भर्‌योड़ी।

सूरज धरती रै किनारां सूं आगै बढणौ सरू कर्‌यौ हौ के अेक जवान लड़की अंधाधुंध ऊंट भगावती सराय पूगी। अचंभै री बात ही के लड़की नै कुम्हार-कुम्हारी झट पिछाण लिया—बहू! उण रै लाडलै री बीनणी! क्यूं आई है इण भांत! इणरौ मुकळावौ करणौ तो वे भूल गया हा।

हाब-गाब हुयोड़ी बहू बतावै के बारै बरसां बाद बावड़ियै आपरै धणी रै बिना उणसूं अेक रात नीं बीती। परदेस सूं बावड़तां वे उणसूं मिल’र आया हा अर कैयौ हौ के मां-बापू सूं मिल’र बेगौ थनै लेवण नै आस्यूं। कुम्हार पूछ्यौ—म्हारौ बेटौ! नीं तो...वो अठै कद आयौ? अर बहू रै हुलियौ बतायां कुम्हार-कुम्हारी नै लखाण हुवै के वे कांई कर न्हाकियौ। वो...वो तो फकत देखण सारू के बारै बरसां बाद मां-बापू उणनै ओळखै के नीं, खुद नै छिपा’र राख्यौ हौ, अर अे आंख्यां कांच री कीकर हुयगी?

कुम्हार अजेज आचैआंच न्हाटै, लारै-लारै कुम्हारी। दोनूं सराय रै कमरै में कैद हुय’र मूंन हुय जावै। बहू आगळ खटखटावै लगौलग...लगौलग। अचाणचक उणनै आपरै पगां में गरमास रौ लखाण हुवै। चिमक’र देखै तो दरवाजै रै नीचै सूं हुय’र गरम-गरम खून बैवतौ रैयौ है। कदम-दर-कदम लारै सिरकती बहू बेचेत हुय’र हेटै पड़ जावै।

जदपि अेक राजस्थानी लोककथा है, पण इणरै लेखक विजयदान देथा रौ अनूठै सबद-संयोजन अर पुराणी कहाणी रै बीच दौड़ती लेखकीय आधुनिक दीठ प्रकाश झा नै इण कहाणी रौ चुणाव करण सारू प्रेरित कर्‌यौ—इस्यौ वां बतायौ।

ऊपर सूं देखियां लोभ-लालच पर बार-बार सुण्यै जावण वाळै शाश्वत संदेस री तरियां दीखण वाळी इण फिलस रौ विश्लेषण समकालीन विश्व रै पूरै परिदृश्य नै दृष्टिगत राख’र करणौ हुसी। सिमरिध देस अर तीसरी दुनिया, इणरौ रिस्तौ इण फिलम रै हरेक दरसाव में परिभाषित कर्‌यौ गयौ लखावै। शूटिंग रै बाद बच्योड़ै केई दौरां सूं निकळ’र फिलम रै रिलीज हुयां राय बणाई जा सकै ‘दामुल’ रौ फिलमकार कांई कीं नवौ कैयौ अर कर्‌यौ है।

तदपि इणमें कोई वैम नीं के प्रकाश झा रौ आप रै माध्यम रै प्रति समरपण असंदिग्ध है। इणरी गवाही में इण फिलम री निरमाण-प्रकिया रौ साक्षी बताय सकै के अनुमानित बजट सूं ऊपर खरचौ चल्यौ गयौ, तो सिरफ रै चालतां के प्रकाश झा किणी स्तर माथै कोई समझौतौ स्वीकार नीं कर्‌यौ।

कामचलाऊ हार्ड-बोर्ड री भींतां री बजाय पूरी सराय रौ ठोस निरमाण करवायौ गयौ। उण माथै प्राचीन राजस्थानी शैली री चित्रामकारी करवाईजी। कुम्हार रौ मुढ-गोबर रौ पूरौ घर बणायौ गयौ। आं स्थूळ आकारां रौ नीं, फिलम रै दरसावां में दीखण वाळी सगळी ‘प्रोपटी’ रौ भटक-भटक’र संकळन-संग्रै कर्‌यौ गयौ। मतलब के कथा री पृष्ठ भूमि में आयै परिवेश नै बौत बारीकी सूं पैली रच्यौ गयौ। ठीक इणी भांत, परिवेश रै अनुकूळ संगीत री रिकार्डिंग, अठै डूंगरगढ में, राजस्थानी वाद्यां अर उणां रै बजावण वाळां नै बुलवा’र करीजी। लोक कलावां रा मर्मज्ञ विद्वान पद्मश्री कोमल कोठारी इण फिलम रौ संगीत निरदेसण कर्‌यौ!

इण फिलम में काम करण वाळा सगळा कलाकार रंगकर्म सूं जुड्योड़ा है। खास भूमिकावां दिल्ली रंगमंच रा कलाकार बसंत जोशिलकर अर सुरेखा सीकरी निभाई। ‘रविवार’ रा छायकार राकेश सहाय, उदयन शर्मा रा सुपुत्र मास्टर कार्तिकेय, वरिष्ठ चित्रकार जतीनदास री सुपुत्री नंदितादास जिस्या अभिनय सूं कोरा लोगां सूं प्रकाश झा बखूबी काम लियौ।

छेहलै, इत्तौ कैवणौ बाकी बचै के उम्मीद राखी जावणी चाइजै के फिलम आपरी प्रस्तुति रै बाद महोत्सव धर्मिता रै छोटै दायरै नै तोड़’र आम दरसकां री वाहवाही अर सरावना ले सकै, तो साच बडी बात हुसी।

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : चेतन स्वामी ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : मई 1987
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