सुख पर सोरठा

आनंद, अनुकूलता, प्रसन्नता,

शांति आदि की अनुभूति को सुख कहा जाता है। मनुष्य का आंतरिक और बाह्य संसार उसके सुख-दुख का निमित्त बनता है। प्रत्येक मनुष्य अपने अंदर सुख की नैसर्गिक कामना करता है और दुख और पीड़ा से मुक्ति चाहता है। बुद्ध ने दुख को सत्य और सुख को आभास या प्रतीति भर कहा था। इस चयन में सुख को विषय बनाती कविताओं का संकलन किया गया है।

सोरठा5

दुख री भली न दाख

साह मोहनराज

आयुस भर आराम

साह मोहनराज

हरी करै सो होय

साह मोहनराज

नयणे मिलसै नैण

जिनहर्ष मुनि ‘जसराज’

वाइस उडी बलाइ ल्युं

जिनहर्ष मुनि ‘जसराज’