सब दिन नहीं समान, ऊग्यो आथमसी अवस।
जग री आ गति जान, चालो सीधा, चकरिया॥
भावार्थ:- हे चकरिया, सब दिन समान नहीं होते (जो आज संपन्न है, वह कल विपन्न एवं जो आज विपन्न है, वह कल संपन्न हो सकता है) । उदित हुआ सूर्य अवश्य अस्त होगा (यानि उत्कर्ष का अपकर्ष निश्चित है) । जगत की (उदय एवं अवसान की) ऐसी गति समझ कर सीधे (सरल, अहंकार-मुक्त) चलो (सन्मार्ग अपनाओ) ।