गुण बिन करै गरूर, बळ बिन बोले आकरो।

बिना आय व्यय पूर, चलै किता दिन, चकरिया॥

भावार्थ:- हे चकरिया, जो मनुष्य गुणहीन होकर भी (मिथ्या) अभिमान करता है, शक्तिहीन होकर भी कटु बोलता है तथा बिना आमदनी के भरपूर ख़र्च करता है— ऐसा कितने दिन चलेगा? (कवि का मंतव्य है कि ऐसा आचार-व्यवहार नहीं चलेगा। गुणहीन का अभिमान कोई सहन नहीं करेगा, निर्बल कटु वचन कहकर पिटेगा और बिना आय के अधिक व्यय कैसे चलेगा?)

स्रोत
  • पोथी : चकरिये की चहक ,
  • सिरजक : साह मोहनराज ,
  • संपादक : भगवतीलाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रंथागार
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