खरी कमाई खाय, हक बरकत हर कोउ कहै।

जाळ कियां सब जाय, चढ़ै पाप सिर, चकरिया॥

भावार्थ :- हे चकरिया, जो अपनी सच्ची उपार्जित कमाई (धन) खाता है, उसे (तदानुसार) उचित लाभ होता (ही) है— ऐसा हर कोई कहता है; परंतु छल-कपट करने से उसका सब-कुछ चला जाता है (नष्ट हो जाता है) और सिर पर पाप चढ़ता है (सो सवाए में अलग)

स्रोत
  • पोथी : चकरिये की चहक ,
  • सिरजक : साह मोहनराज ,
  • संपादक : भगवतीलाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी ग्रंथागार
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