हिम्मत तब ही होय, किम्मत जब कोई करै।
क़िस्मत लखै न कोय, चलै न हिम्मत, चकरिया॥
भावार्थ:- हे चकरिया, हिम्मत तब ही होती है, जब कोई उसकी क़ीमत अर्थात् क़द्र करे; जब कोई उसकी (हिम्मत की) क़ीमत ही नहीं समझता है, तो फिर हिम्मत नहीं चलती (टूट जाती है) ।