अेक भायौ छै अेक बाई छै, अेक म्हूँ अेक वाँ की माई छै ध्यान में काणाँ काँई धार चल्या घणी अंधारी छ’ या रात, पण हुयो कांई काल की चंता कांई न तू ई सुधर्यो न म्हूँ अ'र यो सारो बीत बी ग्यो थे तो हद सूं ई बध गया जी ऊ जद बी झाँकै आकाँ सूँ