तिहि तीरथ मेरा मन न्हावे, जिहि तीरथ का थाघ आवे॥

तिहि तीरथ मेरा मन न्हावे, जिहि तीरथ का थाघ आवे॥

सो बाहरि भीतर नेड़ान दूरि, सो जल आवे सहज हलूरि॥

मुक्ता झूलि रह्या सर पूरि, तिहिं सर न्हावे पंचू दूरि॥

अड़सठ तीरथ तिन थैं भला, तिस तीरथ मेरा मन चला॥

तिन कै न्हाये निरमल होइ, अैसा तीरथ और कोइ॥

सुखसागर तीरथ कानांउ, तिहि सागर में डूबी पाउं॥

आठ पहर ताही में रहूँ, अैसा तीरथ और कहूँ॥

अवरण वरण बहुत विसतार, ता का सूझै वार पार॥

राँम कलस ता माँहू भरे, तहाँ ‘बखना’ साँपडि सेवा करे॥

स्रोत
  • पोथी : बखना जी की वाणी ,
  • सिरजक : बखना जी ,
  • संपादक : मंगलदास स्वामी ,
  • प्रकाशक : लक्ष्मीराम ट्रस्ट, जयपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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