म्हे क्यांन्हैं कहां रे, कोई भावै तैठा जाव।

काळ करम तौ छूटसी, जे लेसी हरि नांव॥

बैर हेत नहीं तिहि जिय सौं, जिहि नर नांव विसार्‌यौ।

साध कहैं सो समझैं नाहीं, जन्म अमोलिक हार्‌यौ॥

हिरदै ग्यांन ऊपजै, बैठि करै बिचार।

मनि बाह्यौ त्युंही बह्यौ मूरिख बड़ौ गंवार॥

गोविंद के नातै मिलै, बिछुड़्या भी वहि हेत।

टीला गुर दादू कहैं, कांइ रहै सुचेत॥

स्रोत
  • पोथी : संत टीला पदावली ,
  • सिरजक : संत टीला ,
  • संपादक : बृजेन्द्र कुमार सिंघल ,
  • प्रकाशक : प्रकाशन संस्थान, दरियागंज, नयी दिल्ली ,
  • संस्करण : प्रथम
जुड़्योड़ा विसै