माया वादली रे, तामैं हरि चंदा दीसै नाँही॥

तिहि कारण दुख पाइ है, कमोदनि जल माँहि॥

माया का वादल मिल्या, चंद छिप्या ता माँहि॥

मोह अंधारा ह्वै रह्या, तांथै सूझै नाँहि॥

वादल बहु भाँति का, पार पावे कोइ॥

नाँ वादल आघाखिसै, ना रैणि उजाला होइ॥

घात घटा बिन ऊलरै, गाजै नित अहंकार॥

तन तृष्णा दिन की पिवे, यों भीगा संसार॥

रन मैं वन मैं घर महैं, घूमि रही सब ठाँइ॥

बङा बङा गैवर गल्या, माया कादो माँहि॥

ज्ञान पवन जे संचरे, तो वादल देइ उडाइ॥

‘बखना’ कँवल कमोदनी, विगसै चंद तहों दिठे जाइ॥

स्रोत
  • पोथी : बखना जी की वाणी ,
  • सिरजक : बखना जी ,
  • संपादक : मंगलदास स्वामी ,
  • प्रकाशक : लक्ष्मीराम ट्रस्ट, जयपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
जुड़्योड़ा विसै