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संत साहित्य पर पद
पद
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दूहा
कवित्त
साखी
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कविता
रमैणी
छंद बेअक्खरी
पद
33
निराकार नहिं ना आकार
संत चरणदास
संतौ भेष भरम कछु नाहीं
रज्जब जी
बाँटो द्यूँ नीरों घणा
बखना जी
देखी मैं डाकणी जरखि चढी
बखना जी
सो भगवांन भलौ रे भाई
संत टीला
हीरा रे अे हीरा रे
संत टीला
दसपदी
संत हरदास
संतौ आई बात बिगोवै
संत हरदास
वीनती हरि तुम्ह सूं मेरी
संत टीला
रे जिय बातनि जनम गवायौ
संत टीला
रांमजी नांव तुम्हारौ दीजै
संत टीला
दरसन सांच जु सांई दीया
रज्जब जी
संतौ अद्भुत खेल अगाधा
रज्जब जी
चल रे मन स्वांमी कै द्वारै
संत टीला
अवधू सब सुख की निधि पाई
संत हरदास
जोगी जग मैं क्यांन्हैं फिरै
संत टीला
भरमतो भरमतो, तुम्हारै सरणै आयो
बखना जी
आप किया की आप हीं करौ
संत टीला
शील बिना नरकै परै
संत चरणदास
भाव भजन की भाठी आगे
बखना जी
हरिभज लाहो लीज्यो रे
बखना जी
जै अपराधी हूं थारौ
संत टीला
तूं साहिब मैं बंदा तेरा
संत टीला
गावङी राखो हरि हावङी करती
बखना जी
देखि चालौ रे बीरा देखि चालौ रे
संत टीला
संतौ बसुधा बिरिछ समाई
रज्जब जी
मन मांनि रे मर्यो
ऊमरदान लालस
रे मन जाहिलौ रे
संत टीला
माया वादली रे
बखना जी
भगति भावै राम भगति भावै
रज्जब जी
पहिले व्यांइति व्याइ गाई
बखना जी
पति की ओर निहारिये
संत चरणदास
संतौ आवै जाइ सु माया।
रज्जब जी