भाव भजन की भाठी आगे, रांम रसायन पीवन लागे॥

भाव भजन की भाठी आगे, रांम रसायन पीवन लागे॥

देहरी कलाली तूँ जिनि नाटै, हरिरस तो है तनकै साटै॥

एक पियाला हमकों दीया, साथी सह मतवाला कीया॥

सद मतिवाले साध हमारे, तन मन कापड़ गहणैं मारे॥

सार सुधारस हिरदा धारे, हरि रस पीवे पिचका डारे॥

पीवे सदा खुमार भागे, ल्यावही ल्याव सदा ल्यो लागै॥

नाचै गावे हरि रस राते, ‘बखना’ दादूपंथी माते॥

स्रोत
  • पोथी : बखना जी की वाणी ,
  • सिरजक : बखना जी ,
  • संपादक : मंगलदास स्वामी ,
  • प्रकाशक : लक्ष्मीराम ट्रस्ट, जयपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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