भो जल क्यूँ तिरों रे, म्हारो पाँण न पूजै कोइ॥
एकही खेवट नाव बिन, डाभक डूभक होइ॥
अति ओंडो आसघ नहीं, कीजै कौन उपाइ॥
पार परोहन नीसरै, जे हरिजी होइ सहाइ॥
पाँच कुसंगी संगी रहे, भूंडा भूँडे भाइ॥
जे हूँ तिरिबा की करों, तो आधो देइ धिकाइ॥
पाँण नही पाँणी महीं, भेले पङी न वाथ॥
जे तूँ तारै तो तिरों, हरिजी पाकड़ि हाथ॥
भो सागर में डूबतां, अबकै लेहु उबारि॥
बखना देरे बूबङी साहिब कै दरबारि॥