आरसङी ऊजली रे, तामै मुखङो दीठो जाइ॥

जिंहि की मैली आरसी, काठ रह्यो तिहिं ठाइ॥

काम क्रोध का मोरचा, भरम करम को काठ॥

आरसङी दीठो नहीं, कबहूँ सिकलीगर को हाठ॥

कारीगर सतगुर मिलै, सबद मसकला लाइ॥

आतम कीन्हीं ऊजली, ता मैं निरमल दरसन थाइ॥

एक तवा एक आरसी, ऊहै बहन ऊहै वीर॥

ऊहै कुसंगती थै कालो हुवो ऊहिं को निरमल देख सरीर॥

एकही आरण नीपनां, एकही घङ्या लुहार॥

दोन्यूँ एकै लोहका, बखना देखि विचार॥

स्रोत
  • पोथी : बखना जी की वाणी ,
  • सिरजक : बखना जी ,
  • संपादक : मंगलदास स्वामी ,
  • प्रकाशक : लक्ष्मीराम ट्रस्ट, जयपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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