आव रे आव मन मूरिखा, बुरौ दिखावै कांइ रे।
त्यांह का कारिज ऊजड़ै, जे घरां परायां जांइ रे॥
घट मांहैं गोब्यंद है, तैठै थारौ बासौ रे।
देखि पराया लूंबका, क्यांन्हैं फिरै उदासौ रे॥
निहिचल है, सुख ऊपजै, अति ही आनंद होए रे।
गोब्यंद कौ सुमिरण करै, तूंनैं बुरौ कहै नहिं कोए रे॥
तूं फिरतां व्हैलौ बावळौ, थारी सुधि बुधि सगळी जाए रे।
कारिज कोई नां सरै, धका किसानैं खाए रे॥
गुर गोब्यंद किरपा करै, तौ मन कहीं न जाए रे।
टीला निंहचल व्है रहै, जे साहिब करै सहाए रे॥