उत सेवा की बौत पण, कछुअक महिना केड़।
सांगा खुद दुरभाग सूँ, ल्यो अंतिम दिन नेड़॥
रण थंबोरी राज दे, 'विक्रम' 'उदय' कुमार।
करुणा राणी कन लख्यो, राणे अंतिम बार॥
करुणा चरणां सिर दियो, फूट पड़्यो अनुराग।
हाय हाय ओ की हुओ, रुठ रुठ गियो सुहाग॥
न्रप पेख्यो पन्ना तरफ, कुँवर उदय हित हाय।
डब डब भरियोड़ा सजळ, नैण लियां निसहाय॥
पन्ना पुनि पुनि धोक दी, फिर फिर जोड़्या हाथ।
ठळक ठळक आंसू बहै, मुखसूँ कढ़ै न बात॥
'सारो रकसण भार भी, म्हूँ माथै लूँ आज।
हर किम्मत पर राण प्रभु, हुकम बजा सूँ राज॥
आ नारी मेवाड़ री, करै प्रतिज्ञा आज।
'उदय' नाम रहसी अमर, दुनिया करसी नाज'॥
सुण भर आयो नीर द्रग, मुख मुळकी मुळकाण।
इक ऊँडी सी आह भर, प्राण तज्यो महराण॥
'रतन' जेठ सुत सौकर व्यो, न्रप चित्तौड़ी और।
हाडी सुत 'विक्रम' निबळ, राजा रणथंबोर॥
ओ सब व्यो पण दुख कथा, व्ही न खतम सारीह।
सांगा सुरंग सिधारतां, हाडी मन हारीह॥
'राज मात मेवाड़ री, हाडी बूंदी हाय।
जय जय रा ठमका लगे, आ दुनिया जस गाय'॥
कह समझाई धाय, गा, हाड़ा रा जस गीत।
संबळ दे इतिहास रो, ल्यो राणी मन जीत॥
हाडी गाढ़ी होयनै, विक्रम लागी समाळ।
इत पन्ना 'चंदन' 'उदय', दउआँ लागी पाळ॥
दउअक वरसां केड़ पण, रतन निधन व्यो हाय।
अब सारा चित्तोड़ रो, भार पड़्यो सिर आय॥
नाजोगो विक्रम लियां, गी हाड़ी चित्तौड़।
राज रखण मेवाड़, धर, रणथंबोरी छोड़॥
नाजोगा जोगा हुवै, किण सूँ भल कीधांह।
की होवै भल बांदरा कर दरपण दीधांह॥
पैलां रणथंबोर फिर, मिलियो गढ़ चित्तौड़।
पण 'विक्रम', विक्रम कठै, रही खोड़ री खोड़॥
तिण पै बादर शाह भी, चढ़ आयो चित्तौड़।
हाडी ज्यूँ त्यूँ देय धन, दियो शाह मुख मोड़॥
'अछन अछन दास्यां रख्यो, कुंवर हथैळी झैल'।
कहि राणी 'विक्रम हुवो, इक रूंई रो पैल॥
'लाड कोड सूँ ही पळै, जग में राज कुमार'।
कहि भूरी 'अब सीखसां, धाय हुँ रखण तुमार॥
म्हां भी लखसां मनख किम, तपै सूर ज्यूँ ताप।
उदय कियां होवै अमर, धायड़ रै परताप'॥
राणि कहि 'परसंग इण, लड़वण री की बात।
पन्ना परतिग्या करी, अंतिम खिण मुख नाथ॥
कहियो सो'ज निभावणो, अब इण रे ही माथ।
काम करो थैं आंपणों, करो न ओछी बात'॥
बिखर गई, सब दासियां, देय चुनौती टीस।
पन्ना घट घुटवण लगी, इक ऊंडी ले रीस॥
जद तद पंडित पूछती, भणवण रा सह हाल।
शस्तर शिकसक पूछती, शिकसण री किहि चाल॥
जाती माता काळिका, फिर फिर शीस नमाय।
खेम कुशन नित मांगती, गीत माय रा गाय॥
मीरा-मां ने धोकती, ले बाळकियां साथ।
सुणती भजन सुणावती, जा मंदिर परभात॥
मीरा मां हँस कैवती, लखियाँ तीनू, बात -
'जचै, जसोदा माय ज्यूँ दाऊ किरसन साथ'॥
पन्ना फिर फिर वंदती, करती नत संवाद।
दाऊ किरसन सा वणै, बगसौ आसिरवाद॥
'दाऊ सो मन बळ मिलै, मिलै द्वारका राज।
किरसन किरपा सूँ सदा, सफल होय सब काज'॥
पण मीरा प्रभु हित लगन, सही न विक्रम राण।
भजन करण दुरलभ हुआ, ल्यो गढ़ सूँ त्राण॥
खोल पिटारो राण रो, सांप धर्यो गळ लीन।
'मुख नाथ्यो गोपाळ जिण, मीरा हित विस हीन॥
किसन पियो विस पूतना, मधु वो मीरा हेत'।
जहर पियो खाली वियां, कह्यो कटोरो देत॥
सांप डरी न विस मरी, हार्यो राणो हाय।
धरम विजय जस गावती, चाली मीरा माय॥
जातां पन्ना पग पड़ी, 'बळ दे देवणहार।
वगत पड़्या विस पी सकूँ, सापां ने गळ धार'॥
मीरां कहि मुसकाय नै, 'हिम्मत कदियन खोय।
किरसन माथै राखियां, जो चावै सो होय'॥
इत विक्रम रा सुधरणा, एक असंभव बात।
इक इक कर सिरदार सब, छोडण लागा साथ॥
इक वेळां फिर शाह तक, खबर गई गुजरात।
मन आई चित्तौड़ पै, राज करण फिर बात॥
ध्रढ़ निश्तै कर शाह फिर, निकल पड़्यो इण बेर।
जीतण नूं चित्तौड़ नै, सबळ सैन सँग लेर॥
खबर पड़ी चित्तौड़ जद, कुपित हुई करुणाह।
रौद्र रूप ज्यूँ काळिका, मुख आई अरुणाह॥
'आए दिन ओ लालची, भिख मंगा ज्यूँ आय।
नागा जोगी सो अठै, दे जोळी फैलाय॥
पन्ना कहि 'बूंदी बहूँ, ले दउ भायां जोड़।
खतरो टळिया राज मां, फिर आसूँ चित्तौड़'॥
उदय हेत करुणा कह्यो, नैणा नीर समेत।
'पन्ना यूँ ही जाण जै, जनम दियो थ्यां हेत'॥
पन्ना पग पकड़्यां कह्यो, नयण लिया जळ धार।
'निज सुत सूँ वदनै सदा, रखसूँ राजकुमार'॥
फिर भूरी नै भी कह्यो, 'विक्रम रो जो मोल।
किहि किहि देसूँ सो सुणो, कान दऊ निज खोल॥
भड़ मरसी दउ कुंवर हित, अठै सहस बत्तीस।
जळसी तेरह सहस तिय, हँस हँस ने बिण टीस॥
तीन सहस बाळक अठै, मांयाँ भर मन जोम।
राज-वंस दिर्घायु हित, निज कर करसी होम॥
हे पन्ने! आ आहुती, रख जो मन संजोय।
राज वंश रकसा करण, सब कुछ कर जो दोय॥
आजादी री आग मन, सिर न झुकै इत कोय।
जळती जौहर जाळ ही, हाडी ठाडी होय॥
हे भूरी, पन्ना बहन, रखजो बाट सँजोय।
प्राण अगिण मेवाड़ियां, निहित भ्रात आं दोय'॥
'यूँ न समझ जै मालकण, थ्यां खूट्यां सब खूट।
पन्ना कदियन रैवसी, यूँ पीनै विष घूंट॥
सहस सहस भाला सकल, सहस सहस तरवार।
मेवाड़ां मन बळ अबै, पन्ना कमर कटार॥
सहस सहस भड़ री भुजा, सहस सहस बळ नार।
बाळकियां बळ आहुती, पन्ना रे अब लार॥
जद तक पन्ना जीवती, अरि जासी मुख मोड़।
हाडी जायो बैठ सी, फिर गादी चित्तौड़'॥
राणी ताणी धाय अर, ले लीधी उर खींच।
इक आतम होवै जियां, सुख लीधो द्रग मीच॥
जावंता पन्ना कह्यो, 'सुण लो सह सिरदार।
आ पन्ना फिर आवसी, करती जय जय कार॥
जद तक पन्ना जीवती, गढ़ रहसी मेवाड़।
थाँ खूट्या मत समझ जो, खूट गई आ राड़॥
थांरो यूँ सिर देवणो, थांरो ओ बलिदान।
कदिअन खाली जावसी, म्हूँ रखसूं इण शान'॥
रोम रोम अभो हुओ, सिरदारां बळवान।
पन्ना रो लख आत्मबळ, मरण हुओ आसान॥
सिरदारां खग खींच कहि, कर ऊँची नभ माँय।
'जय जय मायड़ भोम री, जय जय पन्ना धाय'॥
पन्ना दास्यां दास ले, लेय रखण दळ साथ।
भाग फाटती वेळ में, चाल पड़ी परभात॥