सुंदर वेस लवेस अनोपम सोवन वान घनी सुघराई।

चौसठि नारि कला गुन जानत हंसनितं बनि चालि हराई॥

छैल छबीली सुहागिण नारि सूं कोकिलकंठ सूं सोभ सवाई।

कहै जसराज इसी त्रिय होत मनो निज हाथ विरंचि उपाई॥

स्रोत
  • पोथी : जिनहर्ष ग्रंथावली ,
  • सिरजक : जिनहर्ष मुनि 'जसराज' ,
  • संपादक : अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : सादूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर ,
  • संस्करण : प्रथम
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