उमटी घनघोर घटा मन की तन की किहुं पीर कहूं।
मोहि श्याम बिना अकुरात तना बिजुरी चमकै अब कसै सहूं॥
अेसी पावस को निस जीवनही बसि कैसी सहेली इकेली रहूं।
जसराज राधा ब्रजराज की जोरि, ज्युं जोरि करूं अब जोरि लहूं॥
तेरैहि पाय परुं मोय छोड़ दै कान रे पाणि कुं जांण दे मोहि अबै।
मेरी सासू विलोकत है समझो मेरी हासि करैगी नणंद सबै॥
तेरे ही मन भायो सोई मन मेरे ही आतुर कामन होत कबै।
जसराज तेरो हूं तेरे ही आधिन कूं हूं आई मिलूंगी कहौगै तबै॥