कोरै कागद माथै
मांड’र कीं चितराम
फेरुं देखूं
वां कागदियां नै सामी राख’र
म्हनै लागै–
म्हैं देवूं खुद नै भरोसौ
अर मांडती जावूं
चितराम हरमेस नुंवा-नुंवा।
मांड तो लेवूं
आडी-तिरछी लीकां
कागदियां माथै
अर भर लेवूं रंग
सजाय लेवूं भीतां माथै
पण कीं दिनां में
उड जावै रंग
मगसी पड़ जावै लीकां
समै रो बायरौ
छेवट मेट देवै म्हारा चितराम।
म्हे मांड सकां चितराम
भर सकां रंग
पण म्हानै परखणौ पड़सी
इण समै नै
करणी पडसी बंतळ
समै रै बायरै सूं
इण सारू म्हारै हाथां में
कूंची अर कलम है
सामी है कोरौ कागद
स्यात उंडी कै है आंख्यां
म्हारै समै रा चितराम सारू।