भागौ बोल्यौ—

अे भाई तारा!

अेक खत तो लिखदे

नुंवै बरस रै नाम—

आवतौ सुख स्यांती ले’र आवै

लड़ाई-झगड़ौ

अर आपसी रगड़ौ

कर आवै लारलै बरस रै नाम

लिछमी सिरखी बहुआं

बळ-बळ’र ना मरै

अर हिवड़ौ ना कांपै

बेटी नै सासरै मेलती बिरियां

सोच’र—

के दायजे रौ दाणौ

ईनै जावतां ना खा ज्यावै

पाळ-पोस’र

बड़ी दोखी खिनावणी करी है

दूजै घर तांई

पाछी ना ज्यावै!

लिख, भाई! लिख

कट-बढ़’र ना मरै

आपस में भाई-भाई

जात, धरम अर सूबां रै नाम ऊपर

कोई चाल ना खेल ज्यावै दुस्मण

हर्‌यौ-भर्‌यौ बाग उजाड़णै तांई

ख्यांत राखी

चौकस रैयी...

लिखदे भाई तारा!

ठोक’र लिखदे!

के अंगूठौ पकड़तै साहूकार री पकड़

इतरी तकड़ी ना हुवै

के बीं री बही

किणी गरीब री

बेड़ी अर हथकड़ी बण ज्यावै

लिखदे भाई!

अेक बात और लिखदे

के म्हैं थारी सरभरा सारू

त्यार खड़्या हां

पलक-पावड़ा बिछायां

सिधारो!

रिधि-सिधी ले’र पधारो!

मिनखपणै रौ बुझतौ दिवळौ

फेरूं जगमगा उठै

लिखदे भाई तारा!

अेक खत तो लिखदे!

नुंवै बरस रै नाम!

ठंडी च्यानणी रात में

थै कद देख्यौ है थार समंदर?

दूर-दूर तांई धोरां ऊपर पसर्‌योड़ी

खेजड़ां अर फोगलां पर अटक्योड़ी,

चांदी जेहड़ी च्यानणी

रूपाळी लहरां उठा देवै

थार समंदर मांय!

किर्रर्र...किर्रर्र कर’र

बोलती कोचरी

रात रै सरणाटै में

आवाज री अेक तीखी

लकीर खींच देवै

अर कठैई भेड़्यां बिचाळै

थारै आवतौ हुसी बसंत

फागण में

अठै तो भाया साढ़ में

जे आसमान फूट ज्यावै

अर जम ज्यावै बाजरी री जड़

पसर ज्यावै

काकड़ियै मतीरियां री बेलां

मूंग-मोठ धरती ढक लेवै

तो सावण-भादवै स्यूं

सगळी रुत हेठी है।

थार है, थार!

अठै सगळी रुत अळगी है...

स्रोत
  • पोथी : माणक पारिवारिक राजस्थानी मासिक ,
  • सिरजक : मंगत ‘बादळ’ ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन
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