पुराणी पीढ़ी आज भी है

अर पैली भी ही।

नई पीढ़ी पैली भी ही

अर आज भी है।

पैली पीढ़ी-पीढ़ी रो आंतरो

शरीर में जरूर हो, पण मन में नीं हो।

आज यो आंतरो शरीर साथै मन पर भी पड़तो लागै है।

पैली नई पीढी सोचती–

पुराणी पीढ़ी जितरै दिनां बैठी रैवै

उतरो ही लाभ है–

सिर पर भार नीं पड़ै

अर टाबरपणो कायम रैवै।

आज नुंई पीढी सोचै है–

पुराणी पीढ़ी बेगो सो अधिकार छोडै

तो आपां गादी पर बैठां, मालक बणा।

आज पुराणी पीढ़ी सोचै–

कदै छोरा बण्यो-बणायो खेल नीं बिगाड़ देवै

पछै ये भी दुख पासी अर आपां भी दुख पास्यां।

आज नुंई पीढ़ी रै मन में संका है।

संसार रो यो सनातन नियम है–

समय पाय’र पुराणी पीढ़ी गादी छोड़ती रैवै

अर नुंई पीढ़ी उण पर बैठती रैवै।

इणीज क्रम में नई पीढ़ी

सदा सूं पुराणी पीढ़ी बणती रैवै है

अर समय रो चक्कर चालतो आवै है।

फेर भी इतरी बात नक्की है कै

जितरी जल्दी नुंई पीढ़ी पुराणी पीढ़ी री गादी लेसी

उतरी ही बेगी बा पुराणी पीढ़ी में भरती हुसी।

इसी हालत में

कै आज री नई पीढ़ी नै या चीज मन्जूर है कै

वा बेगी ही बूढ़ै बाळका री मंडळी में।

भरती हुवै।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : मनोहर शर्मा ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : जुलाई, अंक 05
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