चीणी चाळा काटगी, हाथां उतरी दाळ।
नाक चढ़ावै नाजड़ो, अै रासन रा हाल॥
छांटा लागै तेल रा, सुण बजारां भाव।
के राज अर के रामजी, दोन्यूं कुचरै घाव॥
चावळ बावळ पैरली, क्यांको ल्यावां घीव।
प्यारो अलूणी जीमतां, काठो होवै जीव।
हर्यै साग री बिध कठै, (न) सूक्योड़ी रो नांव।
मिरचां है तो मौज है, (नहीं) सूका बाजै ठांव॥
कठै ओकात चरित री, माया है सिरमोर।
चावै ऊंचो नाक नै, बण ज्या काळो चोर॥
भलो आदमी बापड़ो, दुखड़ा पावै भोत।
पकड़ै गेलो सांच रो, मरज्या गंडक मौत॥
सैक्यूं गिटै घिनावरा, अनीत सूं आबाद।
अै चूंसारा खून रा, छोड़ै कोनी राद॥
छूरी देवै राद में, ना आवै मिचळान।
भरै पाप सूं ओजरो, काटै खुद री रान॥
ऊपर मार्यां हांफळा, खा सी खाली खार।
ऊंडो गोतो मारजे, मिलै मोती हजार॥
अंतस ऊंडी उतरसी, पुगतां-भरवां चीज।
थोथो तिरसी ओगदो, कही आर्किमिडीज॥
मेकाले री लाडली, ठालां री मारांड।
पुड़िया है या ज्हैर की, लागै मीठी खांड॥
भूखा मारै डांचळी, धाया करै उबाक।
खावै कोनी बांट कै, आं में बड़ग्यो बजराक॥
‘गीत’ गेरती गोरड़ी, अब गावै बा गाळ।
‘भंवरा’ पोत उघाड़ियो, फैसण रो घमचाळ॥
डाको फैसण रो पड़्यो, लुटग्या सै संस्कार।
नखरो बढग्यो मोकळो, निमड़्या सै आचार॥
घुंघटाळी कठपुतळी, करसी कांई न्ह्याल।
दस्खत करै गुलाबड़ी, राज करै गोपाल॥
माणस लोभी लालची, बण बैठ्यो सिरमोर।
सूंत्या संसाधन घणा, विस फैल्यो चहुंओर॥
चमकै हीरा मोतियां, दाड़ू दांतां चूंप।
कंचन काया कामणी, रूप जाणै रसकूप॥
सूरत तेरी सांवळी, सोनल तेरा केस।
चैरो चमकै चांदसो, मनड़ो मोती भेस॥
नैणां नदिया नेह री, इमरत बरसै होठ।
हिवड़ै लहरां हेत री, रूप रत्न री मठोठ॥
रग-रग इमरत सांचरै, रूं-रूं छलकै रूप।
मेळो ओ रस-रंग रो, कितरो बण्यो अनूप॥