गवाळियौ

आप रै अळगोजै सूं

कानां में मीठौ रस सींच देवै

हुती-हुती हु री

लांबी राग खींचता गादड़ा

अर बांनै पडुत्तर देंवता गंडक के

किणी पंखेरू रै

पांख्यां री फड़फड़ाहट

सुणी है?

देखी है आंख्यां सूं

च्यानणी रात उपर उतरती

काळमस री अेक पड़त अर

गरम हुतौ मौसम?

स्रोत
  • पोथी : माणक पारिवारिक राजस्थानी मासिक ,
  • सिरजक : मंगत ‘बादळ’ ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन
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