कलमां की कोड्यां,

भाग की बिसात,

हर बार तीन काण्या पड़्या!

हारबो कर्‌या सारी रात

तो भी खेलता रैया

सांगोद को न्हाण,

कोटा को दसरावो,

बूंदी की तीज

सब का सब

दांव पै लगा द्‌या;

तो भी जोत्या

अेक मुट्ठी

भुस का बीज;

काळज्या का फफोला,

आंख्यां का प्हैल,

सांसा की सोरम,

रंग-अर रोगन को

सारो ही कोरम

ताखड़ो का अेक पालड़ा में मैल द्‌यां

पालड़ो थोड़ो-सो नम्यो;

थानै

अेक कलदार

टण्णा देणी सूं

उछाळ द्‌यो,

म्हांको पालड़ो

पळट'र उंधो जा पड़्यो;

काळज्या का छाला फूटग्या,

तड़फबा लागी धूळा में

कंचन की आंख्यां की पूतळ्यां;

बेबवारी होगी

सांसा की सोरम,

अेक ही सुर में सुरसती को सारो कोरम

थांका चांदी का बारणा पै

विरद कहबा लाग ग्यो!

तहसील का सहणा!

सब थांकी दाब में, धौंस मैं;

क्यूंक!

थां अेक बस्ता में

आखा हल्का की

जमीन ल्यां फरो छो

थां मनख होया,

शेषनाग होग्या!

फरणाओ तो भी म्हाकी तकदीर

अर डसो, तो भी

म्हांको भाग।

म्हां!

अेक पोथी

अर अेक पाटी;

पींदै टूटी कुरसी

माथा पै बोद्‌यां की टाटी

तड़का की घंटी

अर शाम की छुट्टी की लेरां

बाजता

बोर्ड अर चाक बीचै

चूरो बण'र घसता

मास्साब छां!

ज्यांकी जिंदगी को

पीळो उजास भी

थांकी आंख्यां मैं खटकै छै!

नीचै-नीचै चुगतो

म्हांकी कलमां को हंसो

थांका झरोखा को आडी झांक्यो तो थांको रेशमी परदो नटग्यो!

पण यूं कांईं

दफेरी में

झालर बजायां सूं सांझ होई छै?

आप पहरो धुप्या कपड़ा

म्हांका का भी कपड़ा पावणा छै;

म्हांकी भी गांठ

धोबी कै यहां छै।

स्रोत
  • पोथी : जागती जोत ,
  • सिरजक : अंबिकादत्त ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर ,
  • संस्करण : अगस्त, अंक 06
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