भारत रै लोकतन्त्र में

सगळा मौज मनावै।

जिणनै मिलै मौको

लूट-लूट’र खावै॥

इण लोकतंत्र मांय

केइयां रा सूरज छिपै नीं।

रात दिन करै मैनत

उण रा चुल्हा जगै नीं॥

जाति, धरम रो भेद घणो

बेइमानी रो राज अठै।

धरम रै नाम सूं हुवै राजनीति

देश रो भलो हुवै कठै॥

वोटां खातिर कीं भी करस्यां

झूठो लारो वोटरां नै देस्यां।

बण्यां पछै प्रतिनिधि

दिखाई पांच बरसां पछै देस्यां॥

बैगा ही मंत्री बण जावै

रात-दिन दोनूं हाथ सूं कमावै।

कार, बंगलो अे.सी. होसी

जनता री कमाई नेता उड़ावै॥

भाषण सूं लोगां नै भरमावै

कादो घणो उछाळता जावै

आथणै बैठ सगळा साथै

अेक थाळी मांय जीमता जावै।

पार्टी बाजी सूं भोळा लोग

आपस में भिड़ता रैहसी।

वोटर हुजैगा नेतां रा गुलाम

वोट नेतां नै मिलता रैहसी॥

लोकतंत्र रो नजारो

देखो संसद रै मांय।

अेक दूजै पर उगळै जहर

चाय पीवै साथै केंटीन मांय।

नेता-नेता रैवै साथै

जनता आपस में भिड़ै।

कुण कैवै, कुण समझावै

भोळा मिनख आपस में लड़ै।

चुनाव रो चक्कर

चालसी जद तांई।

जाति, धरम रा हुयसी झगड़ा

भोळी जनता रो कुण सांई॥

घोटाळां री अठै भरमार

नित उठतां ही नूंवो तैयार।

उपर सूं चौखा दीखै

करै भतीर सूं मार॥

भूख, उघाड़ा टाबर रोवै

दो जून री रोटी नै तरसै

नेता आप आपरो घर भरै

बरसात अकूरड़ी पर बरसै॥

देस चालै राम भरोसै

कुण है इण रो नाथ।

लोकतंत्र रा अै मजा

लैवो सगळा मिल’र साथ।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : रामजीलाल घोड़ेला ‘भारती’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-29
जुड़्योड़ा विसै