बंद कै दिन

अईयां ईं घूमता-फिरता

पूंच गिया मैदान कानी।

देख्यो—

पार्क स्ट्रीट रा मोड़ पै

काळो लबादो पैर्‌यां अेक बुत

लाजां रो मारो

मूंडो नीचो कर'र खड़यो है।

'आराम-हराम है' री आंख्या रै सामनै

पुरो सहैर आराम सूं बंद मना रह्यो है।

थोड़ी दूर और आगै

मैदान रै अेक कोणै में

गोडाल्यां तक धोती पैहरो वो बुत

नंगो बदन

लाठी रो आसरै ले आज भी

जइयां चालबा की कोशिश कर रह्यो है

“कर्म ही जीवन है” नै परे राख

पूरो सहैर ठालो—बैठ्यो सो

गप्प-सड़ाकां में मौज मार रह्यो है।

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