म्हे तो प्रीत लूटाई अणहद,

पण थे घणी उदासी दी।

म्हे तो समदर कर्‌या निछावर,

पण थे नदियां प्यासी दी।

पंथ-पंथ में नैण बिछाया,

नैणां करी अडीक घणी।

आवणियां फेरूं नीं आया,

दरस दुसमणी करी घणी।

थांरै खातर तन-मन दाझ्या,

हिवड़ै हेत तलासी दी।

आनै पूछां बांनै पूछां,

पूछ-पूछ थाक्यां जावां।

अतो-पतो नीं मिळै कठै ई,

ढूंढ-ढूंढ झांक्यां जावां।

जीवण होगो दोरो-दोरो,

थे युग्धार चला सी दी।

सुख बिसरायो चेन गमायो,

नैणां नींद नहीं आवै।

हिवड़ै सूळ उठै जाण्या,

कठै-कठै आवै-जावै।

म्हारै खातर मूंधा होग्या,

औरां हाट लुटा सी दी।

म्हां समझायां, समझ आवै

बां समझायां समझ करो।

अपणौ हित अणहित नी जाणै,

थे ज्ञानी जो गजब करो।

म्हे तो बाग लगायौ थां हित,

पण थे साख गमा सी दी।

कितरा दिन री रूप-रास है,

इण रौ कंईं गमेज करो।

तो तार-तार होणी है,

इतरौ कंई बंधेज करो।

म्हे तो थांरै सुरमो सार्‌यौ,

पण थे निजर घुमा सी दी।

म्हे तो प्रीत लुटाई अणहद,

पण थे घणी उदासी दी।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : कल्याणसिंह राजावत ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 13
जुड़्योड़ा विसै