सूरज नुंवै दिन

रात री काळूं’स पूंछ’र

लाल सूखो हुय’र

वहीर हुवै...

पण, म्हारै अठै आवतां-आवतां

खंखळीज जावै।

सूरज!

तूं फगत धान नीं बधावै

तूं सगती रौ भण्डार है

तनै अंवेरणा पड़सी कई काम

तनै जात-पांत रा जेवड़ा

अर सुवारथ रा धाबा

बाळणा पड़सी

तनै लुक्यां नीं सरैला

रात रा पाप अर दिन रा जुल्म

अबै जोवणा पड़सी

नींतर थारै में ईज

तप कीकर रैवैला

रात री काळूंस सूं

लोग परभात नै यूं नीं उडीकै

आभै रा प्यारा

तनै घालणौ पड़सी धरती सूं

हेत सवायौ

तनै मारणा पड़सी अठै री

भूख गरीबी अर अभाव अकाळ

साची तनै जोतणा पड़सी

आंरा जोसीला घोड़ां नै

अठै रै लोगां साथै...

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : श्याम महर्षि ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन ,
  • संस्करण : फरवरी 1986
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