इतरो आसान कोनी

सूरज बणनो

अेक चक्र रै साथै

चालतो रैवणो हरमेस

खुद री किरणां नै

करणो खुद सूं दूर

आसान कोनी व्है

घड़ी-घड़ी खुद नै ईज

जळावणो नै लोगां नै

रोसनी देवणो

आसान कोनी व्है

हर बगत त्यार रैवणो

लोगां रै जीवण सारू

अगूणो म्हारी दिसा

बताय दी उद्गम री

आथूणो म्हारै अस्त री

बो ईज चक्र

बरसां सूं निभाय रैयो हूं

ज्यूं लुगाई

निभा रैयी है

आज तांई—

सोरो कोनी

लुगाई बण जावणो

नीं कदै'ई खुद रो

सोचणो, नीं जीवणो

हरमेस जीवणो

दूजां रै खातर।

स्रोत
  • पोथी : राजस्थली ,
  • सिरजक : सुमन पड़िहार ,
  • संपादक : श्याम महर्षि ,
  • प्रकाशक : मरुभूमि शोध संस्थान राष्ट्रभाषा हिन्दी समिति
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