चोखो तकड़ो पड़ै तावड़ौ,

कृषक मोडै लियो फावड़ौ।

गरम लूआं रा लपका चालै,

पण धंधा नै रोज सम्भाळै।

रोटी लेके आयो डावड़ो,

धक-धक करतो बगै फावड़ो।

दोफारी स्यूं दिन ढळ चाल्यो,

हळ मोरखियो झट जुड़ चाल्यो।

खेत नापतो बगै पांवडो,

कांटा, कींकर करै घावड़ो।

सूरज ढळै अर दिन छिप चाल्यो,

पण गरमी कैवै मनै खाल्यो।

अब हळ छोडो म्हारा भाइड़ों!

हुई ठंड अर भगै तावड़ो।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : बिशनाराम स्वामी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-17
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